सुनीता देवी, महिला उत्थान खबर के साथ
चंबा रुमाल को पारंपरिक कला से आगे बढ़ाकर बनाया सशक्तीकरण का जरिया
28 वर्षों में पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं कुंडी गांव की सुनीता
संवाद न्यूज एजेंसी
मैहला (चंबा)। जिले की शांत वादियों में सुई और धागे ने चुपचाप क्रांति लिख दी जहां हर टांका सिर्फ कपड़े पर नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता पर उकेरा जा रहा है।
गांव कुंडी की सुनीता देवी ने 28 वर्षों में चंबा रुमाल को महज एक पारंपरिक कला से आगे बढ़ाकर इसे महिलाओं के सशक्तीकरण का माध्यम बना दिया है। घर की चहारदीवारी से निकली यह पहल आज आंदोलन बन चुकी है। 53 वर्षीय सुनीता देवी पत्नी महेंद्र सिंह इस पारंपरिक कला को न सिर्फ सहेज रही हैं, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक भी पहुंचा रही हैं। सुनीता ने वर्ष 1998 में एक वर्ष चंबा रुमाल की कढ़ाई का प्रशिक्षण राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत कारीगर कमला नैय्यर से लिया। तब से लगातार कढ़ाई के कार्य को आगे बढ़ा रही हैं। उन्होंने रुक्मिणी विवाह जैसे अत्यंत बारीक और भावनात्मक विषय पर आधारित बड़े रुमाल भी तैयार किए हैं। इनमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह का सुंदर चित्रण किया जाता है। सुनीता बिना किसी सहायता खुद रंगों का चयन कर इस कला को जीवंत रूप देती हैं। वर्ष 2014-15 से वह अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले में लगातार प्रदर्शनी लगाकर चंबा रुमाल कला को व्यापक पहचान दिला रही हैं। सरस मेला मंडी, कुल्लू में आयोजित मॉडल आर्ट एंड ट्रेडिशनल क्राफ्ट कार्यशाला और दिल्ली के ललित होटल और कुंज होटल में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर प्रदेश का नाम रोशन किया है।
युवतियों को भी दे रहीं निशुल्क प्रशिक्षण
सुनीता ने वर्ष 2021 में नारायण स्वयं सहायता समूह का गठन किया। इसके माध्यम से स्थानीय महिलाओं को जोड़ा और घर पर ही प्रशिक्षण देना शुरू किया। स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर चुकीं युवतियों को भी पारंपरिक कढ़ाई का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। गांव की महिलाओं और युवतियों को निशुल्क प्रशिक्षण दे रही हैं।