होली (चंबा)। जनजातीय क्षेत्र होली में बागवानी का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक रूप से सेब की खेती पर निर्भर रहने वाले किसान अब जापानी फल (पर्सिमन) और कीवी की ओर रुख कर रहे हैं। बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और बाजार में विदेशी सेबों की प्रतिस्पर्धा के चलते स्थानीय बागवान सेब की खेती से निराश दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में बागवानी विभाग द्वारा लाई गई पौधों की खेप में सेब के पौधों की मांग अपेक्षाकृत कम रही, जबकि जापानी फल और कीवी के पौधों की बिक्री अधिक दर्ज की गई। ग्राम पंचायत कुठेड़, लामू, दयोल, बजोल, न्याग्रां और क्वारंसी सहित अन्य पंचायतों के किसान इन वैकल्पिक फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
क्यों घट रहा है सेब का आकर्षण
बागवानों का कहना है कि सेब की खेती अब पहले की तुलना में अधिक खर्चीली हो गई है। कीटनाशकों और खाद की लागत बढ़ी है। मौसम में बदलाव के कारण उत्पादन प्रभावित होता है। बाजार में विदेशी सेबों के आयात से स्थानीय उत्पाद को उचित मूल्य नहीं मिल पाता। किसान रमेश कुमार और सुनील कुमार बताते हैं कि कई बार लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है, जिससे नुकसान सहना पड़ता है।
जापानी फल और कीवी क्यों बन रहे विकल्प?
किसानों के अनुसार जापानी फल कम लागत में स्थिर उत्पादन देता है। रोग और कीट अपेक्षाकृत कम लगते हैं। कीटनाशकों पर खर्च कम होता है। बाजार में कीमत 175 से 300 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है। कीवी के भी अच्छे दाम मिल रहे हैं, जिससे किसानों को बेहतर आय की उम्मीद है। बागवान शक्ति प्रसाद और राज कुमार का कहना है कि इन फसलों से आय में विविधता आएगी और सेब पर निर्भरता कम होगी।
एक सप्ताह में जापानी फल और कीवी के पौधों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। विभाग उच्च गुणवत्ता वाले पौधे उपलब्ध करवा रहा है और किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जा रहा है। पंकज कुमार, प्रसार अधिकारी, उद्यान विभाग
चुनौतियां भी मौजूद
विशेषज्ञों का मानना है कि नई फसलों के साथ विपणन, भंडारण और भविष्य में संभावित बाजार संतृप्ति जैसी चुनौतियों पर भी ध्यान देना जरूरी होगा। दीर्घकाल में संतुलित फसल विविधीकरण ही किसानों की आय स्थिर रखने में सहायक होगा।