8-9 हजार की चार्जिंग मशीन बनी ग्रामीणों की पहली पसंद
घंटों का काम मिनटों में, घासनियों में बदला मेहनत का अंदाज
संवाद न्यूज एजेंसी
चंबा। कभी पहाड़ की घासनियों में सुबह की शुरुआत दराती की खनक से होती थी। ढलान पर झुककर महिलाएं और ग्रामीण घंटों घास काटते, फिर सिर पर भारी गट्ठर उठाकर घर लौटते थे।
अब घास वही है, घासनी वही है और पशुओं के चारे की जरूरत भी वही, लेकिन घास काटने का तरीका बदल गया है। गांवों में इस बार दराती के साथ बैटरी से चलने वाली घास काटने की मशीन भी खूब नजर आ रही है।
पशुपालन से जुड़े ग्रामीण इन दिनों सालभर के चारे का इंतजाम करने के लिए घास काटकर सुखाने में जुटे हैं। पारंपरिक दराती से घास काटने में समय और मेहनत दोनों अधिक लगते हैं। पहाड़ी ढलानों पर लगातार झुककर काम करने से शरीर पर थकान हावी हो जाती है। कई बार घंटों मेहनत के बावजूद घास काटने का काम पूरा नहीं हो पाता।
अब करीब 8 से 9 हजार रुपये में मिलने वाली बैटरी चालित मशीन ने यह मेहनत काफी आसान कर दी है। चार्ज करने के बाद मशीन को घासनी तक ले जाना आसान है और इसमें तेल या पेट्रोल की जरूरत नहीं पड़ती। यही सुविधा ग्रामीणों को सबसे ज्यादा पसंद आ रही है।
इससे पहले तेल से चलने वाली घास काटने की मशीनों का चलन बढ़ा था। इनकी कीमत करीब 15 से 20 हजार रुपये तक है। इसके मुकाबले बैटरी मशीन कम कीमत में मिलने के कारण ग्रामीणों के बजट में भी आसानी से फिट हो रही है।
ग्रामीण जगदीश चौहान, बलदेव चौहान, मनिंद्र कुमार, केशव, निर्मला देवी, कांतो देवी और पुष्पा देवी ने बताया कि दराती से घास काटने में काफी समय और मेहनत लगती थी। मशीन से कम समय में अधिक घास काटी जा रही है। इससे काम जल्दी पूरा होने के साथ शरीर की थकान भी कम हो रही है।
हालांकि गांवों में आज भी कई लोग दराती से ही घास काट रहे हैं, लेकिन नई पीढ़ी और पशुपालकों में मशीन को लेकर खासा उत्साह है। पहाड़ों की घासनियों में दराती की खनक अब मशीन की घरघराहट में बदल रही है। तकनीक ने ग्रामीण जीवन की इस पारंपरिक मेहनत को भी आसान बनाने की राह पकड़ ली है।