भरमौर (चंबा) मणिमहेश यात्रा के दौरान दूसरा पड़ाव सुंदरासी अपनी प्राकृतिक सुंदरता से श्रद्धालुओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है। प्रकृति की सुंदरता को देखकर श्रद्धालु अपनी थकान भूल जाते हैं।
पहले पड़ाव यानी धन्छौ में रात्रि ठहराव के बाद श्रद्धालु अगले पड़ाव सुंदरासी के लिए चढ़ाई चढ़ते हैं तो बीच में तो उनका पड़ाव सुंदरासी होता है। यह धन्छौ से साढ़े तीन किलोमीटर दूर है। समुद्रतल से यह पड़ाव 10,500 फीट की ऊंचाई पर है। इस घाटी में चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले रहते हैं। इन्हें देखकर श्रद्धालु काफी आनंदित होते हैं। श्रद्धालुओं को धन्छौ से होते हुए बांदरघाटी, जबाडू और शिवघराट मार्ग पर चढ़ाई चढ़ते कठिन परीक्षा देनी पड़ती है। इस कठिन परीक्षा को पूर्ण करने के बाद श्रद्धालु सुंदरासी पहुंचते हैं। अधिकतर शिव भक्तों की इस रास्ते पर सांस की परेशानी भी आती है। जब श्रद्धालु सुंदरासी पंहुचते है सुंदर फूल और जड़ी-बूटियों की सुगंध से मदहोश हो जाते हैं।
सुंदरासी के बारे में जनश्रुति है कि यहां एक शिला है, जहां हनुमान अपने आराध्य देव श्रीराम की भक्ति में लीन रहते हैं। जो भक्त यहां से आगे राम नाम का भजन करता है, उसकी यात्रा सुगम हो जाती है। भगवान शंकर भी तभी खुश होते हैं, जब भक्त राम नाम श्वास रूपी मंत्र में लीन होकर आगे का सफर करते हैं। सुंदरासी से आगे महारुद्र अवतार हनुमान श्रद्धालुओं की यात्रा को सुख और आनंदमय कर देते हैं। उन्हें यात्रा पर कोई कष्ट नहीं होता। महंत आकाश गिरि और दत्तात्रेय गिरि सुंदरासी के बारे में बताते हैं कि यहां एक शिला है, जहां हनुमान भगवान राम की भक्ति करने में लीन रहते हैं।