अठलुई पंचायत के 12 गांवों को नहीं मिली सड़क, लोग पैदल करते हैं आठ किमी सफर
लोग बोले- कई बार मांग उठाई, आश्वासन ही मिले, पालकी में ले जाने पड़ते हैं मरीज
नेक सिंह ठाकुर
साहो (चंबा)। अठलुई पंचायत के गांवों में आज भी विकास की तस्वीर सड़कों से नहीं, बल्कि खच्चरों की टापों और पालकी के कंधों से लिखी जा रही है। डगौला से गुणू तक 12 गांवों की जिंदगी उस रास्ते पर ठहरी है जहां हर जरूरी चीज पहुंचने में घंटों का पैदल सफर और मुश्किल हालातों से जूझना पड़ता है। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच यह इलाका आज भी उस इंतजार में है जहां सड़क सुविधा किसी योजना का हिस्सा नहीं, बल्कि लोगों की सबसे बड़ी जरूरत बनकर अधूरी खड़ी है। पंचायत के डगौला, मटेना, कागा, बेहि, धजल, देहरोली, चलोगा, ककरी, त्रीथा, समेला और गुणू सहित 12 गांव सड़क से कोसों दूर हैं।
ग्रामीणों को घर का सामान, खाद्य सामग्री, सब्जियां, फल और खेती से जुड़ी सामग्री खच्चरों पर ढोनी पड़ती है। मरीजों और बुजुर्गों को पालकी में मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाता है। करीब आठ किलोमीटर दूर सड़क होने से लोगों को वहां तक पहुंचने में दो घंटे का पैदल सफर करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शासन और प्रशासन से सड़क बनाने की मांग उठाई लेकिन हर बार आश्वासन ही मिला। चुनावों में नेताओं के दौरे जरूर होते हैं लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांवों की सुध लेने वाला कोई नहीं रहता। समेला गांव में कुछ वर्ष पहले भीषण आग लगने से आठ घर जलकर राख हो गए थे। यदि गांव तक सड़क होती तो समय पर अग्निशमन विभाग की गाड़ियां पहुंच सकती थीं और बड़ा नुकसान टल सकता था। घटना के बाद भी सड़क निर्माण को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
आज भी गांव में बीमार व्यक्ति को पालकी में सड़क तक पहुंचाना पड़ता है। सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है लेकिन गांवों की स्थिति आज भी वैसी ही है। स्कूल तक नहीं है और स्वास्थ्य सुविधा भी शून्य है। - हेम राज
राशन, गैस सिलिंडर और खेती का सामान खच्चरों पर ढोना पड़ता है। बरसात के मौसम में रास्ते और भी खतरनाक हो जाते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बुजुर्गों को होती है। सालों से संघर्ष कर रहे हैं। - भगत सिंह
कई बार प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को सड़क की मांग भेजी लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। चुनाव के समय नेता गांव पहुंचते हैं और बाद में कोई नहीं आता। इस क्षेत्र में अधिकांश किसान और बागवान हैं। - उत्तम सिंह
समेला गांव में बीते वर्ष आग लगने से आठ घर जल गए थे। अगर सड़क होती तो दमकल की गाड़ी पहुंच सकती थी। अब भी लोग डर के साये में जी रहे हैं। दो घंटे का सफर तय करने के बाद सड़क नसीब होती है। - जय सिंह