मिंजर मेला: चंबा की संस्कृति, आस्था और भाईचारे का जीवंत उत्सव
हिमाचल प्रदेश का अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि चंबा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कृषि परंपरा और सामाजिक सौहार्द का जीवंत प्रतीक है। सदियों से मनाया जा रहा यह उत्सव हर वर्ष श्रावण मास में आयोजित होता है और देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं व पर्यटकों को आकर्षित करता है।
कैसे शुरू हुई परंपरा?
लोक परंपराओं के अनुसार, मिंजर मेले की शुरुआत चंबा रियासत के प्रारंभिक दौर से मानी जाती है। माना जाता है कि किसी महत्वपूर्ण विजय और समृद्ध फसल की खुशी में लोगों ने राजा का स्वागत धान और मक्की की बालियों के प्रतीक 'मिंजर' से किया। धीरे-धीरे यह परंपरा एक बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक मेले में बदल गई, जो आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
क्या है 'मिंजर' का महत्व?
'मिंजर' रेशमी धागों से तैयार की जाने वाली एक विशेष लटकन होती है, जो धान और मक्की की नई बालियों का प्रतीक मानी जाती है। इसे अच्छी फसल, खुशहाली और समृद्धि का संदेश देने वाला शुभ प्रतीक माना जाता है। मेले के दौरान लोग इसे अपने वस्त्रों पर धारण करते हैं और मंदिरों में अर्पित करते हैं।
ऐसे होती है मेले की शुरुआत
श्रावण मास के दूसरे रविवार को पारंपरिक शोभायात्रा के साथ मेले का शुभारंभ होता है। शोभायात्रा में भगवान लक्ष्मीनारायण और भगवान रघुनाथ मंदिर में मिंजर अर्पित की जाती है। इसके बाद ऐतिहासिक चौगान मैदान में ध्वजारोहण कर आठ दिवसीय मेले की औपचारिक शुरुआत होती है।