श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्री राम कथा का श्रवण करते हुए श्रध्दालु। स्रोत: संवाद
-श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्रीराम कथा का पांचवां दिवस
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के डियारा सेक्टर स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्री राम कथा के पांचवें दिन कथावाचक पुनीत शर्मा ने प्रभु राम की बाल लीलाओं का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के दर्शन के लिए भगवान शिव काल भूषण ज्योतिषी का रूप धारण करके आए थे।
उन्होंने कहा कि प्रभु राम ने बाल्यकाल में भी कई शिक्षाएं प्रदान कर समाज को सही रास्ते पर जाने का सदमार्ग दिखाया। जब भगवान राम अपने भाइयों के साथ गुरुकुल की शिक्षा ग्रहण कर वापस आए तो दशरथ के दरबार में विश्वामित्र क्रोध में पहुंचे ।उन्होंने अपने आश्रम और यज्ञ में ताड़का, मारीच व सुबाहू के आतंक के बारे में बताया और उनसे भयमुक्त करने की गुहार लगाई। दशरथ ने विश्वामित्र को का आश्वास्त किया कि वह सेना भेज कर स्वयं संचालन करते हुए इन आताताइयों का वध करेंगे। विश्वामित्र ने जिद्द की और कहा कि राम व लक्ष्मण उनके शिष्य हैं और उनके बाहुबल से वे भलिभांति परिचित हैं। इसलिए वह उन्हें आश्रम में ले जाना चाहते हैं। महाराज दशरथ ने काफी मना किया, लेकिन वह विश्वामित्र के हठ के आगे हार गए। उन्होंने राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के संग वन में भेज दिया। वहां पर उन्होंने महाबलशाली ताड़का का वध किया। कथावाचक ने बताया कि श्री राम का जन्म ही धरती पर से अत्याचार मिटाने के लिए हुआ। इसी दौरान उन्हें मिथिला नरेश जनक की गुणवती पुत्री सीता के स्वयंवर की सूचना मिलती है। ऋषि विश्वामित्र दोनों भ्राताओं को अपने साथ इस स्वयंवर में भाग लेने के लिए निकल पड़ते हैं। रास्ते में उन्हें एक विरान, उजड़ा हुआ वन मिलता है जहां पर एक उपेक्षित सी शिला दिखाई देती है, जिसका रहस्य श्री राम विश्वामित्र जी से पूछते हैं। तब उन्होंने कहा कि यह आहिल्या है और गौतम ऋषि के श्राप के कारण यह पाषाण बनी है। लेकिन जब तक भगवान इसे स्वयं स्पर्श नहीं करेंगे, इसका उद्धार नहीं होगा। विश्वामित्र के कहने पर भगवान राम ने शिला को स्पर्श किया और वह पल भर में नारी रूप लेकर अंतर्ध्यान हो गई। कथा समापन पर श्री राम के भजन गाए गए और प्रसाद वितरित किया गया।