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Bilaspur News: भागवत कथा सुनाया अश्वत्थामा का प्रसंग

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श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्रीमद भागवत कथा में उपस्थित श्रध्दालु। संवाद
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-श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में कथा का हुआ आयोजन
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। शहर के श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक पुनीत शर्मा ने अश्वत्थामा की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि महाभारत में कौरवों और पांडवों के बीच राज्य प्राप्ति के लिए युद्ध हुआ था।
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इस युद्ध में कौरवों की तरफ से गुरु द्रोणाचार्य और उनके पुत्र अश्वत्थामा ने भी युद्ध लड़ा था। द्रोणाचार्य को संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तो वह भटकते-भटकते हिमाचल की वादियों में पहुंच गए। वहां पर उन्होंने तपेश्वर महादेव नामक स्वयंभू शिवलिंग की पूजा अर्चना कर एक पुत्र की प्राप्ति की। अश्वत्थामा भगवान शिव का ही अंश था। उसके सिर पर जन्म से ही एक मणि थी जो कि उसे किसी भी राक्षस, असुर, मानव, जानवर, देव के सामने निडर बनाए रखती थी। उनकी माता का नाम कृपि था। कृपि और द्रोणाचार्य ने काफी संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत किया। अश्वत्थामा को दूध भी पीने को नहीं मिलता था। जब उनकी गरीबी चरम सीमा पर पहुंच गई। तब द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर जाने का निर्णय लिया। वहां उन्होंने कौरवों, पांडवों के साथ अश्वत्थामा को भी शस्त्र और शास्त्र विद्या का ज्ञान दिया। द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा ही एक समय पांडवो की सेना पर भारी पड़ रहे थे। तब भगवान श्री कृष्ण को युक्ति आई। उन्होंने सोचा कि क्यों न गुरुदेव को बल से नहीं छल से पराजित किया जाए। भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि आप गुरु द्रोण को कहिये की अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया, जिससे गुरुदेव शोक में डूबकर अपने हथियार त्याग देंगे। युधिष्ठिर ने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए में गुरुदेव के खिलाफ छल करने के लिए भी तैयार हूं। कृष्ण ने एक हाथी की ओर इशारा करते हुए कहा कि उस हाथी का नाम तो बताइए मजले भैया, भीम कृष्ण जी की युक्ति समझ गए और उस हाथी को मारकर गुरु द्रोण के सामने चले गए व कहने लगे कि गुरुवर मैंने अश्वत्थामा को मार डाला। इस पर द्रोणाचार्य को भरोसा नहीं हुआ उन्होंने अपने सारथी को कहा कि रथ को युधिष्ठिर की तरफ ले चलो। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि क्या यह सत्य है कि अश्वत्थामा की मृत्यु हो चुकी है, तब युधिष्ठिर ने कहा कि हां अश्वत्थामा मारा गया। जिस वक्त युधिष्ठिर ने कहा लेकिन हाथी उस समय कृष्ण ने शंखनाद कर दिया था, जिससे गुरु द्रोण को लगा कि अश्वत्थामा उनका पुत्र मारा गया। इस तरह युधिष्ठिर के मुंह से झूठ नहीं निकला। यह बात धर्मराज युधिष्ठिर के मुंह से सुनने के बाद द्रोणाचार्य शोक में डूबकर अपने सारे शस्त्र जमीन पर डाल दिए। शोक में डूबे हुए द्रोणाचार्य को निहत्था पाकर द्रौपदी के भाई ध्रष्टध्म्युन ने उनका सर धड़ से अलग कर दिया। कथा समापन पर लोगों को प्रसाद बांटा गया।
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