जिला अस्पताल से लेकर एम्स तक के विभागों में है विशेषज्ञों की फौज
सुविधाओं के अभाव में 150 किमी दूर पीजीआई के भरोसे हैं लोग
आग की चपेट में आने वाले बदकिस्मत मरीजों के लिए रेफरल पर्ची से ज्यादा नहीं व्यवस्था
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा भले ही बुलंद नजर आता हो, लेकिन आग की चपेट में आने वाले मरीजों के लिए यहां की व्यवस्थाएं रेफरल पर्ची से आगे नहीं बढ़ पाई हैं। जिले में सर्जन, त्वचा रोग विशेषज्ञ और प्लास्टिक सर्जन जैसे बड़े नाम मौजूद हैं, लेकिन उन्हें काम करने के लिए जरूरी बर्न यूनिट आज तक नहीं मिल सकी। नतीजा यह है कि गंभीर रूप से झुलसे मरीजों को 150 किलोमीटर दूर चंडीगढ़ ले जाते समय रास्ते में ही उनकी सांसें टूट जाती हैं।
पड़ताल में सामने आया कि जिला अस्पताल से लेकर प्रदेश के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान एम्स बिलासपुर तक में विशेषज्ञों की कोई कमी नहीं है। दोनों संस्थानों में जनरल सर्जन और त्वचा रोग विशेषज्ञ तैनात हैं। एम्स में तो प्लास्टिक सर्जरी का विभाग अलग से कार्य कर रहा है, जो जलने के बाद की जटिल सर्जरी करने में सक्षम है। लेकिन सुविधाओं के अभाव में विशेषज्ञों को अपने मरीज पीजीआई रेफर करने पड़ते हैं। जानकारी के अनुसार जलने वाले मरीजों के लिए सबसे बड़ा दुश्मन संक्रमण होता है। उन्हें अन्य मरीजों के साथ सामान्य वार्ड में नहीं रखा जा सकता। उनके लिए एयर-कंडीशंड, संक्रमण मुक्त और आधुनिक उपकरणों से लैस अलग बर्न यूनिट अनिवार्य है, जिसका जिले में पूरी तरह अभाव है। वर्तमान में जिला अस्पताल में केवल मरहम-पट्टी और प्राथमिक उपचार की सुविधा है। यदि मरीज की स्थिति गंभीर है, तो उसे एम्स भेजा जाता है, लेकिन वहां भी बर्न यूनिट न होने के कारण मरीज को पीजीआई चंडीगढ़ रेफर कर दिया जाता है। लेकिन चिंता का सबसे बड़ा विषय यह होता है कि कई बार मरीज पीजीआई पहुंच ही नहीं पाता है और उसकी रास्ते में ही मौत हो जाती है। ऐसे में प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं की लचर व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है।
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जलने के बाद पहले 4-6 घंटे इलाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
बिलासपुर से चंडीगढ़ का 150 किमी. का सफर पहाड़ी रास्तों और ट्रैफिक के कारण डेढ़ से दो घंटा समय लग जाता है। इस लंबे सफर के दौरान मरीज का फ्लूइड लॉस और संक्रमण का खतरा इतना बढ़ जाता है कि पीजीआई पहुंचते-पहुंचते कई बार बहुत देर हो चुकी होती है।
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350 करोड़ का प्रोजेक्ट : उम्मीद बड़ी पर इंतजार लंबा
एम्स बिलासपुर में 350 करोड़ रुपये की लागत से एक ट्रामा सेंटर प्रस्तावित है। योजना के अनुसार, इसी सेंटर में एक स्टेट-ऑफ-द-आर्ट बर्न यूनिट भी बनाई जाएगी। हालांकि, अभी इस प्रोजेक्ट की केवल शुरुआती कवायद ही शुरू हुई है। इसे धरातल पर उतरने और मरीजों के लिए खुलने में अभी कम से कम 2 से 3 साल का समय लग सकता है। तब तक जिले के लोगों के पास चंडीगढ़ की दौड़ लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
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पड़ताल के बड़े सवाल
जिले में जलने वाले मरीजों को मिलने वाले उपचार की पड़ताल में सवाल यह भी उठा कि जब एम्स में प्लास्टिक सर्जरी जैसे विशेष विभाग के लिए करोड़ों खर्च किए गए, तो एक बर्न यूनिट को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई? क्या ट्रामा सेंटर बनने तक जिला अस्पताल या एम्स में वैकल्पिक तौर पर 5-10 बिस्तरों की एक आइसोलेशन बर्न यूनिट तैयार नहीं की जा सकती। जिले में राज्य सरकार की ओर से भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की सैलरी पर लाखों खर्च हो रहे हैं, लेकिन उपकरणों और सुविधाओं के अभाव में उनकी विशेषज्ञता का लाभ मरीजों को क्यों नहीं मिल पा रहा।
केस स्टडी
झंडूता के खुरजाल गांव निवासी संजीव कुमार की मौत केवल एक हादसा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव की एक कड़वी हकीकत है। 5 नवंबर 2025 की रात तेज तूफान और बिजली गुल होने के बीच संजीव शादी समारोह से लौटते समय खाना बनाने वाली चर में गिर गए। झुलसी हुई हालत में संजीव को झंडूता अस्पताल ले जाया गया, जहां से उन्हें एम्स बिलासपुर रेफर कर दिया गया। एम्स में विशेषज्ञ डॉक्टर तो थे, लेकिन बर्न यूनिट न होने के कारण वहां से भी पीजीआई चंडीगढ़ के लिए रेफरल की पर्ची थमा दी गई। एम्बुलेंस 150 किलोमीटर दूर पीजीआई के लिए दौड़ती रही, लेकिन कुराली (पंजाब) पहुंचते-पहुंचते मरीज की सांसों ने साथ छोड़ दिया।
कोट
जिला अस्पताल में सभी विभागों के विशेषज्ञ हैं जो जलने वाले मरीजों के इलाज के लिए जरूरी हैं। प्राथमिक उपचार भी मरीज को तुरंत मिलता है। लेकिन इन मामलों में संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। गंभीर रूप से जले मरीज को प्राथमिक उपचार के बाद ही बर्न यूनिट की सुविधा के अभाव में रेफर किया जाता है।
डॉ. एके सिंह, एमएस बिलासपुर