स्वारघाट (बिलासपुर)। सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिड-डे मील तैयार करके परोसने वाले वर्करों के आगे खुद के घर का चूल्हा नहीं जलने की नौबत खड़ी हो गई है। मिड-डे मील वर्करों को गत दो माह से मानदेय नहीं मिला है। आसमान छू रही महंगाई के चलते उन्हें घर का खर्च चलाना बहुत मुश्किल हो गया है।
एटक यूनियन से संबद्ध मिड-डे मील वर्कर यूनियन की प्रदेशाध्यक्ष कमलेश ठाकुर ने बताया कि बिलासपुर जिले के 2,500 से अधिक मिड-डे मील वर्करों को मई और जून का मानदेय अभी तक नहीं मिला है, जबकि जुलाई का महीना भी खत्म होने वाला है। मिड-डे मील वर्करों को इस समय महज 2,600 रुपये महीना मानदेय मिलता है। वह भी समय पर नहीं मिलता। कभी दो महीने के बाद तो कभी चार महीने बीत जाने के बाद इन वर्करों को मानदेय दिया जाता है। मिड-डे मील बनाने के कार्य में 90 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं। इनमे अधिकतर महिलाएं गरीबी रेखा से नीचे आती हैं और कई महिलाएं विधवा हैं। महंगाई के दौर में 2,600 रुपये में गुजारा कर पाना मुश्किल है।
प्रदेश सरकार ने अप्रैल 2022 से मानदेय में 900 रुपये की बढ़ोतरी करने की मंजूरी प्रदान की थी, लेकिन आज दिन इसे लागू नहीं किया जा रहा है। इसके अलावा करवाचौथ और भैयादूज की छुट्टी नहीं मिल रही है। इससे मिड-मील वर्कर महिलाओं में रोष है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग के उदासीन रवैये से गुस्साए जिले के पांच शिक्षा खंडों में कार्यरत मिड-डे मील वर्कर 26 जुलाई को सुबह 11:00 बजे बिलासपुर के लक्ष्मी नारायण मंदिर में जुटेंगे। वहां से रैली निकालेंगे और जिलाधीश बिलासपुर के कार्यालय में धरना-प्रदर्शन करेंगे। मुख्यमंत्री को उपायुक्त के माध्यम से ज्ञापन भेजेंगे।