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फूलां चंदेल का निधन: 11 साल की उम्र से शुरू हुआ घट नृत्य का सफर दुनिया तक पहुंचा, अब यादों में लोक कलाकार

Mon, 28 Sep 2026 10:42 AM IST
Ankesh Dogra संजीव शामा, (घुमारवीं) बिलासपुर।

सार

हिमाचल प्रदेश की प्रसिद्ध लोक नृत्यांगना फूलां चंदेल के निधन से प्रदेश ने लोक संस्कृति की एक समर्पित साधिका खो दी। 63 वर्ष की उम्र में रविवार सुबह घंडालवीं में उन्होंने अंतिम सांस ली। करीब पांच दशक से अधिक समय तक लोक नृत्य को समर्पित फूलां चंदेल ने घट और पूजा नृत्य के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिमाचल की संस्कृति की पहचान बनाई। महज 11 वर्ष की उम्र में गांव के मंच से शुरू हुआ उनका सफर रूस, चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, दुबई समेत कई देशों तक पहुंचा।
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फूलां चंदेल (फाइल फोटो)। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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घट नृत्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला का लोहा मनवाने वाली प्रसिद्ध नृत्यांगना फूलां चंदेल (63) का निधन हो गया। रविवार सुबह करीब 5:30 बजे पैतृक गांव घंडालवीं (घुमारवीं) में उन्होंने अंतिम सांस ली। वह कुछ समय से बोन कैंसर से जूझ रही थीं। उनका उपचार पहले एम्स बिलासपुर, फिर पीजीआई चंडीगढ़ में चल रहा था। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका कला के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ था। क्षेत्र के मेलों, उत्सवों और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वह सक्रिय रूप से भाग लेती थीं। फूलां चंदेल शिक्षा विभाग में कार्यरत रहीं और कुछ वर्ष पूर्व स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी रहीं। उन्होंने नटराज कला मंच की स्थापना भी की। उनका अंतिम संस्कार घंडालवीं में किया गया। उनके निधन पर सीएम सुखविंद्र सिंह सुक्खू, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर, सांसद अनुराग सिंह ठाकुर, तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी, पूर्व मंत्री राजेंद्र गर्ग व अन्य ने शोक जताया।

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पांच दशक तक लोक संस्कृति की साधना, 
रविवार को 63 वर्ष की आयु में फूलां चंदेल के निधन के साथ प्रदेश केवल एक कलाकार नहीं खोई, बल्कि लोक संस्कृति की ऐसी साधिका को खो दिया, जिसने अपने जीवन के पांच दशक से अधिक समय लोक नृत्य को समर्पित कर दिए। बीमारी से जूझते हुए भी उनकी पहचान मंच, लोक नृत्य और सांस्कृतिक परंपराओं से बनी रही। उन्होंने लोक कला को केवल प्रस्तुति का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।

घुमारवीं तहसील के सोई गांव में 10 अक्तूबर 1963 को दामोदरी देवी और काशीराम चंदेल के घर जन्मीं फूलां चंदेल का लोक नृत्य से रिश्ता किसी औपचारिक प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि गांव की मिट्टी और लोक परंपराओं से बना। महज 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने गांव में पहली बार नृत्य की प्रस्तुति दी। बचपन में शुरू हुई यह साधना किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते जुनून में बदल गई। मंच पर उनका आत्मविश्वास, संतुलन और कठिन प्रस्तुतियों को सहजता से निभाने की क्षमता धीरे-धीरे उनकी अलग पहचान बनती गई।

सिर पर गिलास, पैरों के नीचे भी गिलास
फूलां चंदेल की कला का सबसे आकर्षक और रोमांचित कर देने वाला पक्ष उनका घट और पूजा नृत्य था। सिर पर पानी से भरे गिलासों को एक के ऊपर एक सजाकर उन्हें संतुलित रखते हुए नृत्य करना अपने आप में बेहद कठिन कला थी, लेकिन फूलां चंदेल ने इसे इतनी सहजता से प्रस्तुत किया कि देखने वालों को कठिनाई का अंदाजा तक नहीं होता था। पूजा नृत्य में वह दर्जनों रंग-बिरंगे पानी से भरे गिलासों को सिर पर साधकर नृत्य करती थीं। कई प्रस्तुतियों में दोनों पैरों के नीचे पानी से भरे गिलासों पर खड़े होकर भी वह नृत्य करती थीं।

गांव से निकली कलाकार, दुनिया के मंच तक पहुंची
हिमाचल के मेलों और स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे प्रदेश और देश के बड़े मंचों तक पहुंचा। उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला, भाषा एवं संस्कृति विभाग, हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी, दूरदर्शन केंद्र, नेहरू युवा केंद्र और युवा सेवाएं एवं खेल विभाग सहित विभिन्न संस्थाओं के मंचों पर उन्होंने प्रस्तुतियां दीं। उनकी कला ने जब प्रदेश की सीमाएं पार कीं तो बिलासपुर का लोक नृत्य भी उनके साथ आगे बढ़ा। सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने रूस, चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, लीबिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, दुबई, नेपाल और भूटान समेत कई देशों में अपनी कला का प्रदर्शन किया।
 

फूलां चंदेल का जीवन केवल मंच तक सीमित नहीं रहा। घुमारवीं में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने ही स्कूल में स्वयंसेवी अध्यापिका के रूप में कार्य शुरू किया। बाद में वह मुख्य अध्यापिका के पद से सेवानिवृत्त हुईं। शिक्षा के क्षेत्र में जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ उनके भीतर की कलाकार लगातार सक्रिय रही।
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कला को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा
फूलां चंदेल ने लोक कला को मनोरंजन तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने ‘नटराज संस्कृति कला मंच’ के नाम से कला जत्था पंजीकृत करवाया। इसके माध्यम से कलाकारों ने गीत, संगीत और नुक्कड़ नाटकों के जरिये विभिन्न सामाजिक मुद्दों और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के प्रति लोगों को जागरूक करने का काम किया।

पीछे छोड़ गईं एक ऐसी विरासत, जो मंच से आगे है
फूलां चंदेल का जाना एक कलाकार का मंच से उतर जाना भर नहीं है। उनके साथ उस पीढ़ी की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी टूट गई, जिसने लोक कला को किताबों और संग्रहालयों में बंद रहने के बजाय मंच पर जीवंत रखा। उन्होंने अपने जीवन से दिखाया कि लोक नृत्य केवल पुरानी परंपराओं की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि साधना, अनुशासन और सृजन के साथ दुनिया के किसी भी मंच पर अपनी पहचान बना सकता है।
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