वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश न्यायालय घुमारवीं का फैसला
जालंधर की फार्मा कंपनी को ब्याज सहित करनी होगी अदायगी
10 साल पुराने सुरक्षा राशि और कमीशन विवाद में आया निर्णय
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश न्यायालय, घुमारवीं ने मेडिकल कारोबार से जुड़े करीब दस साल पुराने विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए जालंधर की एक फार्मा कंपनी को बिलासपुर के कारोबारी को 8 लाख 80 हजार 388 रुपये लौटाने के आदेश दिए हैं। अदालत ने यह राशि छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करने का निर्देश दिया है। यह फैसला वरिष्ठ सिविल जज की अदालत ने सुनाया।
मामला बिलासपुर के मुख्य बाजार स्थित मेडिकल एजेंसी और पंजाब के जालंधर स्थित फार्मा कंपनी के बीच चल रहा था। अदालत में दायर वाद के अनुसार सूर्या मेडिकल एजेंसी के संचालक सूर्य प्रकाश ने बताया कि वर्ष 2010 में वायोमेड फार्मा ने उन्हें हिमाचल प्रदेश में दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की सप्लाई, भुगतान संग्रहण का कार्य सौंपने का प्रस्ताव दिया था। इसके लिए कंपनी ने उनसे पांच लाख रुपये की सुरक्षा राशि जमा करवाने को कहा। वादी के अनुसार 16 नवंबर 2010 को पंजाब नेशनल बैंक बिलासपुर का पांच लाख रुपये का चेक कंपनी को दिया गया। इसके बदले कंपनी ने सुरक्षा राशि पर प्रति माह तीन प्रतिशत कमीशन देने, पर्याप्त दवाइयों का स्टॉक उपलब्ध करवाने, एक्सपायरी और टूट फूट वाली दवाइयों का भुगतान करने तथा परिवहन व कोरियर खर्च वहन करने पर सहमति जताई थी। बाद में कहा गया कि जुलाई 2013 तक प्राप्त दवाइयों और अन्य सामग्री का पूरा भुगतान कंपनी को कर दिया गया था, लेकिन उसके बाद कंपनी ने न तो सुरक्षा राशि लौटाई और न ही तय कमीशन, एक्सपायरी-ब्रेकेज का भुगतान किया। कई बार आग्रह के बावजूद हिसाब-किताब नहीं चुकाया गया। इसके बाद वर्ष 2016 में अदालत में रिकवरी का दीवानी वाद दायर किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी कंपनी अदालत में उपस्थित नहीं हुई। न ही उसकी ओर से कोई अधिवक्ता पेश हुआ। इस पर अदालत ने कंपनी को एक्स-पार्टी घोषित कर दिया। वादी पक्ष की ओर से अदालत में चार गवाह पेश किए गए।
सूर्य प्रकाश ने हलफनामे के माध्यम से पूरे मामले की जानकारी दी। पंजाब नेशनल बैंक बिलासपुर के प्रबंधक ने अदालत में बैंक रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हुए पुष्टि की कि पांच लाख रुपये की राशि संबंधित चेक के माध्यम से प्रतिवादी के खाते में ट्रांसफर की गई थी। समझौते के गवाहों ने भी अदालत में बयान दर्ज करवाते हुए कहा कि दोनों पक्षों के बीच समझौता उनकी मौजूदगी में हुआ था और दस्तावेज पर हस्ताक्षर भी उनके सामने किए गए थे। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि वादी पक्ष द्वारा पेश किए गए दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड और गवाहों के बयान विश्वसनीय तथा अप्रतिवादित हैं। अदालत ने माना कि प्रतिवादी कंपनी ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया और सुरक्षा राशि व कमीशन का भुगतान नहीं किया। इसी आधार पर अदालत ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 8 लाख 80 हजार 388 रुपये की वसूली का दावा स्वीकार कर लिया। अदालत ने आदेश दिए कि प्रतिवादी कंपनी वादी को उक्त राशि वाद दायर करने की तारीख से अदायगी तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करेगी।