जिले में फर्जी कार्य, गलत मस्टरोल, अधिकारियों की मिलीभगत के आरोप
आपदा राहत के नाम पर एक लाख रुपये लेने का मामला भी पहुंचा अदालत
फोरलेन प्रभावित समिति ने दायर की थी जनहित याचिका
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने जिले में मनरेगा फंड और आपदा राहत राशि के कथित दुरुपयोग के मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को तीन माह के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि मामले की जांच कर नियमानुसार समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने यह आदेश जनहित याचिका का निपटारा करते हुए पारित किया। अदालत ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को पूरे मामले पर तीन माह के भीतर फैसला लेने को कहा है। यह जनहित याचिका बिलासपुर आधारित फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन शर्मा द्वारा दायर की गई थी। समिति लंबे समय से फोरलेन परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के मुद्दे उठाती रही है। याचिका में आरोप लगाया गया कि बिलासपुर जिले में मनरेगा योजना के तहत सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया और ऐसे कार्यों के नाम पर भुगतान कर दिया गया, जिनका जमीनी स्तर पर कोई अस्तित्व ही नहीं था। याचिका में कहा गया कि सरकारी रिकॉर्ड में कई ऐसे कार्य दर्शाए गए, जो वास्तव में मौके पर किए ही नहीं गए। इसके बावजूद संबंधित लोगों को भुगतान जारी कर दिया गया। याचिका में एक विशेष मामले का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया गया कि वर्ष 2023 में घुमारवीं उपमंडल के बकरोआ गांव में एक व्यक्ति ने अपनी जमीन पर भूस्खलन होने का दावा किया। इसके आधार पर उसे आपदा राहत मद से लगभग एक लाख रुपये की राशि स्वीकृत कर दी गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि संबंधित भूमि पर वास्तव में कोई भूस्खलन नहीं हुआ था, फिर भी अधिकारियों ने बिना उचित जांच के राहत राशि जारी कर दी। इससे सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला सामने आया।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि संबंधित व्यक्ति पेशे से अधिवक्ता है, लेकिन उसे मनरेगा के आधिकारिक मस्टर रोल में मजदूर के रूप में दर्ज किया गया। याचिकाकर्ता ने इसे सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर और नियमों के उल्लंघन का गंभीर मामला बताया है। पीआईएल में कहा गया कि मनरेगा जैसी रोजगार योजना गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए बनाई गई है, लेकिन कुछ लोगों ने प्रभाव और मिलीभगत के जरिए इसका गलत लाभ उठाया। याचिका में राजस्व विभाग के अधिकारियों और स्थानीय पंचायत कर्मचारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। आरोप लगाया गया कि संबंधित अधिकारियों ने लाभार्थियों के साथ मिलकर नियमों की अनदेखी की और फंड स्वीकृत कराने में सहयोग किया।
याचिकाकर्ता के अनुसार यदि समय रहते जांच नहीं हुई तो भविष्य में भी योजनाओं में इसी तरह की अनियमितताएं जारी रह सकती हैं। याचिका में अदालत से मांग की गई थी कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच करवाई जाए तथा आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाए। साथ ही स्वीकृत राशि की रिकवरी और दोषियों पर 10 लाख रुपये का उदाहरणात्मक हर्जाना लगाने की भी मांग की गई।
हाईकोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित विभाग को निर्देश दिए हैं कि पूरे मामले की जांच कर तीन माह के भीतर निर्णय लिया जाए। अदालत के इस आदेश के बाद अब प्रशासनिक और पंचायत स्तर पर की गई कार्रवाई पर नजरें टिक गई हैं।