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Bilaspur News: श्रद्धालुओं को भक्ति मार्ग पर चलने का दिया संदेश

Fri, 13 Mar 2026 11:00 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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डीहर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का वाचन करते हुए पंडित दिवाकर शुक्ला। स्रोत: जागरूक पाठक।
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डीहर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का चौथा दिन
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संवाद न्यूज एजेंसी
भगेड़ (बिलासपुर)। उपमंडल घुमारवीं की ग्राम पंचायत मोरसिंघी के गांव डीहर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन पंडित दिवाकर शुक्ला ने मंगलाचरण के साथ कथा का शुभारंभ किया और भगवान श्रीहरि की महिमा का गुणगान करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को भक्ति मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
उन्होंने भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए मंगलाचरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि मानव जीवन को धर्म, ज्ञान और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करने वाली अमृतधारा है। उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करता है, उसके जीवन के अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं और मन को शांति प्राप्त होती है। इस दौरान उन्होंने महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव स्वामी के जन्म का दिव्य प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि शुकदेव स्वामी जन्म से ही ब्रह्मज्ञानी और वैराग्य भाव से युक्त थे। वह गर्भ से ही आध्यात्मिक चेतना में स्थित थे और जन्म लेते ही सांसारिक मोह-माया से दूर वन की ओर प्रस्थान कर गए। उनकी तपस्या, ज्ञान और वैराग्य के कारण ही उन्हें राजा परीक्षित को श्रीमद् भागवत कथा सुनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कथा में देवर्षि नारद के प्रेरणादायी चरित्र का भी विस्तार से वर्णन किया गया। पंडित ने बताया कि देवर्षि नारद भगवान के परम भक्त थे और सृष्टि के कल्याण के लिए निरंतर भ्रमण करते रहते थे। उन्होंने ही महर्षि व्यास को भक्ति मार्ग का महत्व समझाते हुए श्रीमद्भागवत की रचना करने की प्रेरणा दी, ताकि कलयुग के लोगों को भक्ति का सरल और सहज मार्ग मिल सके।
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उन्होंने बताया कि महर्षि व्यास ने वेदों और अनेक पुराणों की रचना करने के बाद भी अपने मन में पूर्ण संतोष का अनुभव नहीं किया। तब देवर्षि नारद के उपदेश से उन्होंने श्रीमद्भागवत पुराण की रचना की। इस ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं, भक्ति और धर्म के मार्ग का अत्यंत सुंदर और विस्तृत वर्णन किया गया है, जो मानव जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता है। पंडित शुक्ला ने महाभारत युद्ध के बाद का मार्मिक प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि युद्ध समाप्त होने के बाद भीष्म पितामह शरशैया पर लेटे हुए भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हैं। उस समय उन्होंने भगवान के साकार स्वरूप का ध्यान करते हुए अपने प्राण त्यागे। भीष्म पितामह की भक्ति और समर्पण प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने माता कुंती की हृदयस्पर्शी स्तुति का भी वर्णन किया गया, जिसमें उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि जीवन में विपत्तियां आती रहें, क्योंकि विपत्ति के समय ही मनुष्य भगवान को सच्चे मन से स्मरण करता है। कथा के अंत में श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन में भाग लिया और भगवान के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
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