- एम्स बिलासपुर में एनाटॉमी विभाग कर रहा लोगों को विकारों के प्रति जागरूक
-अनुवांशिक विकारों में न करें अनदेखा, समय रहते विशेषज्ञ से लें परामर्श : डॉ. निधि
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। अधिक जन्म दर के कारण भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश है। देश के कुछ हिस्सों में पारिवारिक संबंधों या एक ही समुदाय में विवाह की प्रथा प्रचलित है। इन्हीं कारणों से हमारे देश में आनुवांशिक (जेनेटिक) विकार अत्यधिक प्रचलित हैं। एम्स बिलासपुर में एनाटॉमी विभाग की ओर से इस विषय पर लोगों को जानकारी देकर जागरूक किया जा रहा है।
एम्स बिलासपुर में एनाटॉमी विभागाध्यक्ष डॉ. निधि पुरी का कहना है कि डाउन सिंड्रोम, थैलेसीमिया और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी आदि आमतौर पर देखे जाने वाले आनुवंशिक विकार हैं। यह आम धारणा है कि आनुवंशिक विकार केवल उसी बच्चे में देखे जा सकते हैं, जिसके परिवार में किसी को आनुवांशिक विकार हो, लेकिन यह एक गलत धारणा है। क्योंकि किसी अन्य के प्रभावित हुए बिना भी जन्म से पूर्व प्रत्येक बच्चे को आनुवांशिक विकार का खतरा हो सकता है। इसके कारणों में मां की आयु 35 वर्ष या उससे अधिक, एक या अधिक गर्भपात, जन्म के बाद या गर्भाशय में शिशुओं की अस्पष्टीकृत मृत्यु, बिना किसी कारण के मानसिक व शारीरिक विकास में विलंब आदि शामिल हैं।
इनसेट
आनुवांशिक विकारों व रोगों को समझने और उनकी रोकथाम में प्रश्न व उनके उत्तर
प्रश्न: यदि एक बच्चा आनुवांशिक रोग से प्रभावित है तो दूसरे बच्चे में इस प्रकार के विकार या रोग की कितनी संभावना है।
उत्तर : प्रत्येक क्रोमोसोम में हमारी एक शारीरिक विशेषता के लिए दो जींस होती हैं। क्रोमोसोम की संख्या व संरचना या जींस अनुक्रम में असमान्यताएं आनुवांशिक रोग का कारण बन सकती हैं। पुनरावृति (रिकरेंस) की दर आनुवांशिक विकार के प्रकार पर निर्भर करती है। जींस दो तरह की होती हैं प्रभावी और अप्रभावी। जींस की असमान्यताओं के प्रभाव भी उसी प्रकार होते हैं।
प्रश्न : बच्चे के जन्म से पहले पुनरावृति को कैसे रोंके
उत्तर : बच्चों के जन्म से पहले भी आनुवांशिक बीमारी का परीक्षण किया जा सकता है। इसके लिए गर्भावस्था से पहले या शुरुआत में जेनेटिक विशेषज्ञ के साथ पूर्व परामर्श आवश्यक है होता है, ताकि होने वाले बच्चों में प्रभाव की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त समय हो। इसके बाद रेडियोलॉजिस्ट या प्रसूति रोग विशेषज्ञ द्वारा की जाने वाली अल्ट्रासोनोग्राफी की सहायता से भ्रूण में गंभीर विकृतियों का पता लगाया जा सकता। इसके अलावा अतिरिक्त क्रोमोसोम या जींस को जांचने के लिए गर्भावस्था से 20 सप्ताह पहले भ्रूण का नमूना लेकर आनुवांशिक प्रशिक्षण किया जाना चाहिए। यदि भ्रूण किसी असाध्य या जीवन सीमित विकार से प्रभावित पाया जाए तो उसे माता-पिता की अनुमति से एमटीपी द्वारा समाप्त किया जा सकता है।
प्रश्न : कौन सी विधियों से लिया जाता है अजन्मे शिशु की आनुवांशिक जांच के लिए नमूना
उत्तर: नाल (प्लेसेंटा), पानी की थैली की कोशिकाओं और भ्रूण में आनुवांशिक समानता होती है। नाल से कोरियोनिक विलस बायोप्सी और एमनियोसेंटेसिस से पानी की थैली में उपस्थित कोशिकाओं का नमूना जांच के लिए लिया जा सकता है। इसके विभिन्न आनुवांशिक विकारों का परीक्षण किया जा सकता है। कोरियोनिक विलस सैंपलिंग आमतौर पर गर्भावस्था के 10 से 12 सप्ताह या उसके बाद के बीच की जाती है। एमनियोसेंटेसिस गर्भावस्था के 16-20 सप्ताह के दौरान किया जाता है। एमनियोटिक थैली तरल पदार्थ की एक थैली होती है, जिसमें बच्चा गर्भ में तैरता है। एमनियोटिक द्रव में शिशु की कुछ कोशिकाएं होती हैं, जिनकी प्रयोगशाला में जांच करके शिशु के जींस और क्रोमोसोम की जांच की जा सकती है।
प्रश्न : कितने सुरक्षित हैं कोरियोनिक विलस सैंपलिंग और एमनियोसेंटेसिस परीक्षण
उत्तर : प्रसव पूर्व परीक्षण के लिए उपयोग की जाने वाली विधियां आमतौर पर सुरक्षित मानी जाती हैं। हालांकि, उनमें कोरियोनिक विलस बायोप्सी के लिए गर्भपात का न्यूनतम जोखिम 0.3 प्रतिशत और एमनियोसेंटेसिस के लिए 0.1 प्रतिशत होता है। अधिकांश मामलों में गर्भ सामान्य रूप से विकसित होता है। यह परीक्षण बेहद सही माने जाते हैं। परीक्षण के गलत होने की संभावना केवल एक से दो प्रतिशत है।
कोट
आनुवांशिक विकारों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। यदि इसका कोई भी कारण किसी भी परिवार में मौजूद है तो होने वाले माता-पिता को गर्भ ठहरने से पहले जेनेटिक विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। यदि पहले ही एक प्रभावित बच्चा है तो अगली गर्भावस्था में एक और प्रभावित बच्चा होने की संभावना अधिक रहती है। गर्भ से पूर्व या गर्भावस्था में विशेष जांच द्वारा इसे रोका जा सकता है और एक सामान्य शिशु पैदा होने की संभावना अधिक हो सकती है।
डॉ. निधि पुरी, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष शरीर रचना विभाग (एनाटॉमी), एम्स बिलासपुर