कोलबांध विस्थापितों और प्रभावितों ने एनटीपीसी पर लगाया एमओयू की अवहेलना का आरोप
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-मांगों को लेकर विधायक की अगुवाई में उपायुक्त को सौंपा ज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कोलबांध परियोजना के विस्थापितों और प्रभावितों ने एनटीपीसी पर एमओयू की अवहेलना करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार और एनटीपीसी में हुए समझौते में विस्थापितों के हितों की अनदेखी की गई थी। एमओयू में आधी-अधूरी जिन सुविधाओं को देने की बात की गई थी, वे भी आज तक नहीं मिल पाई हैं। अपनी मांगों को लेकर मंगलवार को विस्थापितों और प्रभावितों ने त्रिलोक जम्वाल की अगुवाई में उपायुक्त आबिद हुसैन सादिक को ज्ञापन सौंपा। उन्होंने कहा कि विस्थापितों में सरकार और एनटीपीसी के प्रति नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है। इस मामले को केंद्र सरकार के समक्ष उठाने के साथ ही सदर के विधायक त्रिलोक जम्वाल कई बार प्रशासन से भी बात कर चुके हैं। उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे आंदोलन करने पर मजबूर होंगे। प्रतिनिधिमंडल में शामिल बीडीसी सदस्य अशोक शर्मा, मान सिंह ठाकुर, श्याम ठाकुर, अमृत बंसल और जगदीश ठाकुर ने कहा कि पुनर्वास उपनगरी सेड़पा में 220 से अधिक परिवार रह रहे हैं। स्थायी पता एक न होने की वजह से उनके बच्चों के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों में विसंगतियां पैदा हो रही हैं। सरकारी दस्तावेजों में भिन्नता के चलते उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कोलडैम हाइड्रो प्रोजेक्ट की पुनर्वास और पुनर्स्थापना योजना में भी खामियां हैं। इसमें परिवारों की परिभाषा बदल दी गई है। प्रोजेक्ट के लिए मकानों व जमीनों का अधिग्रहण करने के बावजूद कई परिवारों को विस्थापित की श्रेणी में नहीं रखा गया है। हक के लिए वे अदालतों के चक्कर काटने पर मजबूर हो रहे हैं। योजना में विस्थापितों को योग्यता के आधार पर स्थाई रोजगार का प्रावधान है, लेकिन एनटीपीसी ने वर्ष 2007 के बाद किसी भी विस्थापित को स्थाई रोजगार नहीं दिया है। विस्थापितों के कोटे के पद दूसरे प्रोजेक्टों से भर दिए गए हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, पुनर्वास योजना के तहत विस्थापितों को मकान और मुआवजा देने की बात की गई थी, लेकिन किसी को भी मकान नहीं मिला। पुनर्वास कॉलोनियों में 50 गुना 40 फीट के प्लॉट के साथ सभी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने की बात भी थी, लेकिन सुविधा के नाम पर कुछ नहीं दिया गया। इनमें पार्क, खेल मैदान, शॉपिंग कांप्लेक्स और स्ट्रीट लाइटें तो दूर, पानी की व्यवस्था तक नहीं है। सड़कें टूटी हुई हैं। सुविधाओं के अभाव में विस्थापित इन कॉलोनियों में प्लॉट लेने से कतरा रहे हैं। आलम यह है कि अभी तक इन कॉलोनियों को सरकार को हैंडओवर तक नहीं किया गया है। विस्थापित हुए सभी लोग खेतीबाड़ी के साथ पशु पालन भी करते थे। उनके सामने यह समस्या भी है कि सीमित आकार के प्लॉटों में वे खुद रहें या मवेशियों को रखें। प्रशासनिक अधिकारी कई बार कॉलोनियों के दौरे कर चुके हैं, लेकिन समस्याएं जस की तस हैं। कोलबांध विस्थापितों और प्रभावितों ने मांग उठाई कि उनकी सभी समस्याएं प्राथमिकता के आधार पर सुलझाई जाएं। डीसी ने प्रतिनिधिमंडल को उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया।