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Bilaspur News: घुमारवीं अदालत का अहम फैसला, सिविल अपील खारिज

Fri, 17 Apr 2026 11:56 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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अदालत से
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एडीजे डॉ. मोहित बंसल ने ट्रायल कोर्ट का निर्णय रखा बरकरार
पुश्तैनी संपत्ति साबित, वसीयत अवैध, 2005 की बिक्री बिना कानूनी आवश्यकता के शून्य मानी गई

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सिविल अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल जज, घुमारवीं की ओर से 26 दिसंबर 2017 को पारित निर्णय एवं डिक्री विधिसम्मत है और उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले के साथ लंबे समय से चला आ रहा पुश्तैनी संपत्ति विवाद एक बार फिर न्यायिक स्तर पर अंतिम चरण में पहुंच गया है और ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार है।
यह पूरा मामला तहसील घुमारवीं के गांव हवाणी की भूमि से जुड़ा है। विवाद परिवार के भीतर संपत्ति के स्वामित्व, हिस्सेदारी और हस्तांतरण को लेकर हुआ था। वादियों का कहना था कि यह भूमि संयुक्त हिंदू परिवार की पुश्तैनी संपत्ति है, जो पूर्वजों से पीढ़ियों में हस्तांतरित होती आई है। इसलिए सभी वारिसों का इसमें जन्म से अधिकार बनता है। इसके विपरीत अपीलकर्ताओं ने इसे स्वअर्जित संपत्ति बताते हुए तर्क दिया कि परिवार के मुखिया को इसे बेचने और वसीयत करने का पूरा कानूनी अधिकार था। अदालत में आए रिकॉर्ड के अनुसार 5 फरवरी 2005 को दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। विवादित भूमि का एक हिस्सा बिक्री के माध्यम से हस्तांतरित किया गया, उसी दिन एक वसीयत तैयार और निष्पादित किए जाने का दावा किया गया। वादियों का आरोप था कि यह दोनों प्रक्रियाएं बिना किसी कानूनी आवश्यकता और परिवार की संपत्ति के हित के खिलाफ की गईं, जिससे अन्य वारिसों के अधिकार प्रभावित हुए। सिविल जज (घुमारवीं) ने गवाहों के बयान, दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड का गहन परीक्षण करने के बाद पाया था कि विवादित भूमि संयुक्त हिंदू परिवार की पुश्तैनी संपत्ति है। संपत्ति को स्वअर्जित साबित नहीं किया जा सका। वसीयत कानून के अनुसार विधिवत रूप से सिद्ध नहीं हुई। बिक्री के लिए कोई कानूनी आवश्यकता या संपत्ति के हित का आधार नहीं पाया गया। 5 फरवरी 2005 की वसीयत और बिक्री संदिग्ध परिस्थितियों में की गई। इन निष्कर्षों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने वादियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें संपत्ति में अधिकार प्रदान किया था।
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अपीलकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि भूमि पुश्तैनी नहीं बल्कि व्यक्तिगत संपत्ति है। वसीयत विधिवत रूप से निष्पादित की गई है और वैध है। वादी लंबे समय से परिवार से अलग रह रहा है, इसलिए उसका कोई अधिकार नहीं बनता। निचली अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया है, वहीं प्रतिवादियों ने दलील दी कि राजस्व रिकॉर्ड से भूमि स्पष्ट रूप से पुश्तैनी साबित होती है। वसीयत के निष्पादन में गंभीर संदेह है। बिक्री और वसीयत एक ही दिन होना संदेह पैदा करता है। निचली अदालत का निर्णय पूरी तरह सही है। अदालत ने पूरे रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि राजस्व रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि भूमि पुश्तैनी है। वसीयत को विधि अनुसार सिद्ध नहीं किया जा सका। बिक्री बिना किसी कानूनी आवश्यकता के की गई। एक ही दिन वसीयत और बिक्री होना मामले की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है। ट्रायल कोर्ट का निर्णय तथ्यों और कानून के अनुरूप है। इन सभी आधारों पर अदालत ने सिविल अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत का निर्णय पूरी तरह सही है और उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप आवश्यक नहीं है।
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