पत्नी और नाबालिग बेटे को अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार
अदालत ने कहा, अलग-अलग कानूनों के तहत भरण-पोषण मांगना कानूनी रूप से मान्य
पत्नी को 2,000 और बेटे को 1,000 प्रतिमाह देने के आदेश कायम
केवल कमाने की क्षमता होने से पत्नी भरण-पोषण से वंचित नहीं हो सकती
नाबालिग बच्चे की बीमारी और पढ़ाई को अदालत ने माना महत्वपूर्ण आधार
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अंतरिम भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में बिलासपुर की अतिरिक्त सत्र अदालत ने पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बिलासपुर की अदालत ने कहा कि पत्नी और नाबालिग बच्चे की आवश्यकताओं को देखते हुए दिया गया अंतरिम भरण-पोषण आदेश उचित और कानून सम्मत है।
मामले में पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 23 के तहत आवेदन दायर कर कहा था कि उसके पास स्वयं और अपने नाबालिग बेटे के पालन-पोषण के लिए कोई स्वतंत्र आय का साधन नहीं है। आवेदन में आरोप लगाया गया कि पति पर्याप्त आय होने के बावजूद परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभा रहा है। ऐसे में अदालत से अंतरिम भरण-पोषण देने की मांग की गई थी। निचली अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद पत्नी को 2,000 और नाबालिग बेटे को 1,000 प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने के आदेश दिए थे। इसके खिलाफ पति ने अतिरिक्त सत्र अदालत में अपील दायर की। अपील में कहा गया कि फैमिली कोर्ट पहले ही धारा 125 सीआरपीसी के तहत पत्नी को 3,500 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दे चुकी है। ऐसे में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अलग से राशि देना कानूनन उचित नहीं है। पति पक्ष ने यह भी दावा किया कि वह ठेकेदार के अधीन पार्ट टाइम वाटर गार्ड के रूप में कार्य करता है और उसकी आय केवल 4,500 प्रतिमाह है। साथ ही यह भी कहा गया कि पत्नी सिलाई का कार्य कर स्वयं आय अर्जित कर रही है। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना। फैसले में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों के अनुसार अलग-अलग कानूनों के तहत भरण-पोषण की मांग की जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले से मिले भरण-पोषण को समायोजित किया जा सकता है, लेकिन इससे दूसरी राहत स्वतः समाप्त नहीं हो जाती। अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह तर्क कि पत्नी पढ़ी-लिखी है या काम करने में सक्षम है, उसे भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता। जब तक पत्नी की पर्याप्त स्वतंत्र आय साबित न हो जाए, तब तक उसे राहत देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
फैसले में अदालत ने पति की आय संबंधी दावों पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में यह तथ्य सामने आया है कि पति के पास मोटरसाइकिल और कार है। ऐसे में केवल 4,500 मासिक आय होने का दावा पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत ने नाबालिग बच्चे की बीमारी, उपचार और पढ़ाई की जरूरतों को भी महत्वपूर्ण माना। फैसले में कहा गया कि बच्चे की चिकित्सा और शिक्षा संबंधी आवश्यकताओं को देखते हुए अतिरिक्त अंतरिम भरण-पोषण देना उचित है। सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद अदालत ने पति की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही दोनों पक्षों को अगली निर्धारित तिथि पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं।