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Bilaspur News: एम्स में अब जोड़ों के दर्द से मिल रही राहत, दो साल में 16 हजार ने करवाया इलाज

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आधुनिक बायोलॉजिक थैरेपी, इंफ्यूजन और रूमेटोलॉजी की सुविधा एम्स में उपलब्ध
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बुजुर्गों को ही नहीं छोटी आयु के लोगों को भी हो सकता है जोड़ों का दर्द

संवाद न्यूजी एजेंसी
बिलासपुर। एम्स बिलासपुर में अब जोड़ों के दर्द से मरीजों को राहत मिल रही है। दो साल में 10 हजार मरीजों ने एम्स में इलाज करवाया। आधुनिक बायोलॉजिक थैरेपी, इंफ्यूजन और रूमेटोलॉजी की सुविधा एम्स में मिल रही है।
जोड़ों के दर्द और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज के लिए अब दिल्ली या चंडीगढ़ की दौड़ नहीं लगानी पड़ रही है। एम्स बिलासपुर के क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी विभाग ने अपनी सेवाओं के दो सफल वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस छोटी सी अवधि में विभाग न केवल एक उपचार केंद्र, बल्कि जटिल बीमारियों के लिए एक बड़े रेफरल सेंटर के रूप में उभरा है।
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आमतौर पर माना जाता है कि जोड़ों का दर्द उम्र बढ़ने के साथ होता है, लेकिन एम्स के आंकड़ों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। रूमेटाइड आर्थराइटिस, ल्यूपस और स्क्लेरोडर्मा जैसी बीमारियां युवाओं और मध्यम आयु वर्ग के लोगों को अपना शिकार बना रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह वह उम्र होती है जब व्यक्ति अपने कॅरिअर के शीर्ष पर होता है। सही समय पर इलाज न मिलने से कई लोग स्थायी विकलांगता का शिकार होकर अपनी आजीविका खो रहे हैं। एम्स में रूमेटोलॉजी सेवाओं के प्रति लोगों का भरोसा तेजी से बढ़ा है। शुरुआत में जहां सालाना करीब 6,000 मरीज ओपीडी में आते थे, अब यह आंकड़ा बढ़कर 10,000 के पार पहुंच गया है। गंभीर मरीजों के लिए अब आधुनिक बायोलॉजिक थैरेपी और इंफ्यूजन की सुविधा भी एम्स में उपलब्ध है, जिससे जटिल से जटिल ऑटोइम्यून रोगों का इलाज संभव हो गया है। लैब में टीबी स्क्रीनिंग सहित अन्य संबंधित 3100 से अधिक एडवांस जांचें की गईं। इन-हाउस लैब होने से रिपोर्ट जल्दी मिलती है और इलाज तुरंत शुरू होता है। विभाग में अब विशेषज्ञता कोर्स के जरिए देश को नए रूमेटोलॉजिस्ट तैयार करके दिए जा रहे हैं। स्क्रीनिंग कैंप और जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए लोगों को लक्षणों के प्रति सचेत किया जा रहा है।
क्लीनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जोड़ों में दर्द के साथ सूजन, सुबह के समय जकड़न या बिना कारण अत्यधिक थकान रहती है, तो इसे नजरअंदाज न करें। ये बीमारियां सिर्फ जोड़ों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि हृदय, फेफड़े और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों को भी धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती हैं। संस्थान का लक्ष्य केवल अस्पताल के भीतर इलाज करना नहीं, बल्कि सामुदायिक स्तर पर जागरूकता फैलाना है। कुलपति डॉक्टर राकेश कुमार सिंह ने बताया कि कार्यकारी निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) दलजीत सिंह के नेतृत्व में हम जांच, शोध और उपचार के हर मोर्चे पर प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने की ओर अग्रसर हैं।
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इनसेट
अब प्राथमिक केंद्रों को भी ट्रेनिंग
एम्स अब प्राथमिक स्वास्थ्य कर्मियों को भी ट्रेनिंग दे रहा है। इसका मकसद यह है कि गांव के छोटे अस्पतालों में तैनात स्टाफ भी शुरुआती लक्षणों को पहचान सकें और मरीज को गंभीर होने से पहले सही जगह रेफर कर सकें।
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