गेहूं विक्रय केंद्र बिलासपुर पहुंचे किसान। स्रोत: डीपीआरओ
80 रुपये किलो में बिक रहा प्राकृतिक गेहूं, बिलासपुर में सरकारी खरीद शुरू होते ही बढ़ा उत्साह
-223 किसानों ने दिखाई उपज बेचने में रुचि
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कभी रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर रहने वाले किसान अब प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह प्राकृतिक उत्पादों को मिल रहा बेहतर मूल्य और सरकार की खरीद नीति बन रही है। जिला बिलासपुर में प्राकृतिक खेती से उत्पादित गेहूं की सरकारी खरीद शुरू होने के साथ ही किसानों में उत्साह का माहौल है। प्रदेश सरकार द्वारा प्राकृतिक गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 80 रुपये प्रति किलोग्राम तय किए जाने से किसानों को अपनी उपज का बेहतर दाम मिल रहा है।
जिला के कई किसानों का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनकी भूमि की उर्वरता में सुधार हुआ है और उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है। यही कारण है कि अब अधिक किसान इस पद्धति से जुड़ने के लिए आगे आ रहे हैं। ग्राम पंचायत कोटला के किसान सुमन कुमार ठाकुर ने बताया कि उन्होंने तीन वर्ष पहले प्राकृतिक खेती शुरू की थी। इस वर्ष उन्होंने करीब 10 क्विंटल गेहूं सरकारी खरीद केंद्र में बेचा है। उनका कहना है कि पहले बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल पाता था, लेकिन अब सरकार द्वारा 80 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीद किए जाने से किसानों को सीधा लाभ मिल रहा है।
वहीं नम्होल क्षेत्र के किसान देश राज का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद खेतों की मिट्टी पहले से अधिक उपजाऊ हुई है। रासायनिक खेती के कारण मिट्टी की सेहत पर पड़ रहे दुष्प्रभाव कम हुए हैं और फसल की गुणवत्ता में भी सुधार आया है। आत्मा परियोजना के आंकड़े भी जिले में बढ़ती रुचि की पुष्टि कर रहे हैं। पिछले वर्ष जहां केवल 40 किसानों से करीब 60 क्विंटल प्राकृतिक गेहूं खरीदा गया था, वहीं इस वर्ष अब तक 120 किसानों से लगभग 160 क्विंटल गेहूं खरीदा जा चुका है। जिले में 223 किसान अपनी प्राकृतिक उपज बेचने के लिए पंजीकरण करवा चुके हैं। परियोजना निदेशक आत्मा रितेश गुप्ता ने बताया कि इस वर्ष 175 क्विंटल गेहूं खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसे जल्द पूरा कर लिया जाएगा। किसानों की सुविधा के लिए बिलासपुर और पट्टा में खरीद केंद्र स्थापित किए गए हैं।
उपायुक्त राहुल कुमार के अनुसार जिले में करीब आठ हजार किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ चुके हैं और 1,094 हेक्टेयर क्षेत्र प्राकृतिक खेती के दायरे में आ चुका है। उनका कहना है कि प्रशासन अधिक से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को इसी प्रकार बेहतर मूल्य मिलता रहा तो आने वाले वर्षों में प्राकृतिक खेती जिले की कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इससे किसानों की आय बढ़ने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी रसायन मुक्त खाद्यान्न उपलब्ध होंगे।