किरतपुर-नेरचौक फोरलेन मामला:
सेवानिवृत्ति के बाद भी आरोपी और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई संभव : हाईकोर्ट
- प्रमुख मुख्य वन संरक्षक को अगली सुनवाई से पहले मांगी विस्तृत रिपोर्ट
-बताएं,वन विभाग के अलावा, एनएचएआई, राजस्व अधिकारी अनियमितता में शामिल थे या नहीं
-28.36 हेक्टेयर भूमि पर केंद्र की अनुमति के बिना कर दिया था रोड अलाइनमेंट में बदलाव
सरोज पाठक
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने फोर लेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार और अन्य मामले में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने के बावजूद आरोपी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई न करना अदालत के आदेशों की अवहेलना है।
अदालत ने 3 जुलाई और 24 जुलाई 2024 को दिए गए अपने पूर्व आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि केंद्रीय सिविल सेवा पेंशन नियम, 1972 के नियम 9 के तहत सेवानिवृत्ति के बाद भी आरोपी और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई संभव है। अदालत ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि नौ आरोपी अधिकारियों में से छह के सेवानिवृत्त होने के कारण जांच लंबित है। अदालत ने प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई से पहले विस्तृत रिपोर्ट पेश करें। इस रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया जाए कि वन विभाग के अलावा राजस्व विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिकारी भी अनियमितताओं में शामिल थे या नहीं। हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में एनएचएआई, वन विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों की भूमिका की जांच भी जरूरी है। अदालत ने 23 फरवरी 2022 के पत्र (अनुभाग आर-3) का हवाला देते हुए कहा कि इन विभागों के अधिकारी भी अनियमितताओं में शामिल हो सकते हैं।
मामला किरतपुर-नेरचौक फोरलेन के रोड अलाइनमेंट में केंद्र की मंजूरी के बिना बदलाव से जुड़ा है। वर्ष 2018 में किरतपुर-नेरचौक फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति ने पर्यावरण मंत्रालय देहरादून में शिकायत दर्ज कराई गई थी कि एनएचएआई ने 28.36 हेक्टेयर भूमि पर केंद्र सरकार की अनुमति के बिना रोड अलाइनमेंट बदल दिया। यह बदलाव श्री नयना देवी जी विधानसभा क्षेत्र के डडनाल जंगल मैहला से पट्टा तक किया गया था। जिसके बाद मंत्रालय ने राज्य सरकार से इसकी रिपोर्ट मांगी थी,लेकिन बार-बार रिपोर्ट मांगने के बाद भी राज्य सरकार ने इसकी रिपोर्ट मंत्रालय को नहीं दी। जिसके बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने मामले में बड़ा कार्रवाई की थी।
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पर्यावरण मंत्रालय ने रोका था फोरलेन का काम
राज्य सरकार से मामले पर रिपोर्ट ने मिलने के बाद जून 2020 में परियोजना का काम रोकने के निर्देश दिए थे। करीब पांच माह तक पूरी परियोजना का काम बंद रहा। इसके बाद मंत्रालय ने इस परियोजना का काम शुरू करने के लिए सशर्त मंजूरी दी। उनमें से कुछ शर्तें तो पूरी हो गईं, लेकिन अभी भी कुछ शर्तें लंबित हैं। जिन पर अब हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया है। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2024 को होगी।
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आरोपियों पर कार्रवाई में देरी
पर्यावरण मंत्रालय के नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई के लिए बिलासपुर के तत्कालीन अरण्यपाल ने 2022 में एक कमेटी का गठन किया था, जिसे 15 दिन में अपनी रिपोर्ट देनी थी। हालांकि, आज तक उस कमेटी ने विभागीय कार्रवाई पूरी नहीं की है। अदालत ने इस देरी पर नाराजगी जताई और सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि आरोपियों को बचाने की कोशिश हो रही है।
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नए अधिकारियों ने भी नई पूरी की जिम्मेदारी:मदन
मामले को कोर्ट लेकर गए फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव मदन लाल शर्मा ने कहा कि पुराने अधिकारी तो सेवानिवृत्त हो गए। लेकिन उनकी जगह जो नए अधिकारी आए उन्होंने भी खामियों को दूर नहीं किया और न ही मामले में कोई कार्रवाई पूरी हुई। जबकि होना यह चाहिए था कि नए अधिकारी जिम्मेदारी को समझते हुए अपना पूरा काम करते।
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