रेलवे निर्माण से प्रभावित व्यास गुफा के नाले का नौण की होगी बहाली
अन्य ऐतिहासिक जलस्रोतों के संरक्षण पर भी जोर
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। पुराने बिलासपुर की पहचान रहे ऐतिहासिक प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण को लेकर प्रशासन ने कदम उठाना शुरू कर दिए हैं। विकास कार्यों और समय के साथ उपेक्षा का शिकार हुए इन जलस्रोतों में से व्यास गुफा स्थित प्राकृतिक जलस्रोत (नाले का नौण) को दोबारा बहाल करने की पहल की गई है। रेलवे लाइन निर्माण के कारण प्रभावित हुए इस सदाबहार जलस्रोत को पुनर्जीवित करने के लिए रेलवे विभाग के माध्यम से कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी ने इस मामले को गंभीरता से उठाते हुए प्रशासन को निर्देश दिए कि रेलवे विभाग से समन्वय स्थापित कर व्यास गुफा की बावड़ी के प्राकृतिक जलस्रोत को जल्द से जल्द बहाल करवाया जाए। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक जलस्रोत केवल पानी के साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर भी होते हैं। कहा कि प्राकृतिक जलस्रोत आपदा और संकट के समय अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए इनका संरक्षण और पुनर्स्थापना हर हाल में सुनिश्चित की जानी चाहिए। व्यास गुफा की बावड़ी के प्राकृतिक जलस्रोत को रेलवे विभाग के माध्यम से शीघ्र बहाल करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। बताते चलें कि पुराने बिलासपुर में कभी लोगों की प्यास बुझाने वाले कई प्राकृतिक जलस्रोत आज अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। भाखड़ा बांध बनने के बाद गोबिंद सागर झील में जलमग्न हुए पुराने बिलासपुर के नाले का नौण, छुताई की बावड़ी और लुहणू घाट की बावड़ी वर्षों तक लोगों के प्रमुख जलस्रोत रहे। झील बनने के बाद भी नए बिलासपुर के लोग इन स्रोतों का पानी कई वर्षों तक इस्तेमाल करते रहे, लेकिन समय के साथ इनकी अनदेखी शुरू हो गई। छुताई की बावड़ी अब गोबिंद सागर झील की गाद में दबकर लुप्त हो चुकी है, जबकि नाले का नौण रेल लाइन निर्माण के कारण प्रभावित हुआ है।
कभी डियारा क्षेत्र की प्यास बुझाता था नौण
व्यास गुफा के पास स्थित नाले का नौण साफ, शीतल और सदाबहार जलस्रोत था। स्थानीय लोगों के अनुसार दो साल पहले तक यह डियारा सेक्टर के लोगों के लिए पेयजल का प्रमुख साधन था। इस स्रोत को लेकर लोगों में धार्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है और मान्यता है कि इसका पानी ऋषि मार्कंडेय मंदिर क्षेत्र से आता था। रेल लाइन निर्माण के दौरान यह प्राकृतिक जलधारा प्रभावित हो गई, जिससे स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई थी। अब प्रशासनिक स्तर पर इसकी बहाली की प्रक्रिया शुरू की गई है।
छुताई बावड़ी बनी पुरानी याद
लुहणू घाट क्षेत्र में स्थित छुताई की बावड़ी पुराने बिलासपुर की प्रसिद्ध जल धरोहरों में शामिल थी। गोबिंद सागर झील बनने के बाद यह बावड़ी हर साल जलस्तर बढ़ने पर डूब जाती थी और पानी कम होने पर दिखाई देती थी। चट्टानों और गाद में दबने के कारण अब यह अपना अस्तित्व खो चुकी है। इस बावड़ी का पानी इतना शीतल और स्वादिष्ट था कि गर्मियों में मेहमानों के स्वागत के लिए भी इसी का पानी लाया जाता था।
लुहणू घाट की बावड़ी भी संरक्षण की देख रही राह
लुहणू घाट की बावड़ी आज भी मौजूद है, लेकिन देखरेख के अभाव में इसकी हालत खराब होती जा रही है। लोगों का कहना है कि पुराने बिलासपुर की इस जल विरासत को बचाने के लिए व्यापक योजना बनाने की जरूरत है। गौरतलब है कि गोबिंद सागर झील की गाद में पुराने बिलासपुर के कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थल भी समा चुके हैं। ऐसे में बचे हुए प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए क्षेत्र की पुरानी पहचान को बचाने का महत्वपूर्ण प्रयास होगा।