बिलासपुर जिले के एक गरीब परिवार की दो बहनों की कहानी ऐसी ही त्रासदी बयां करती है। मां के सपनों को पूरा करने के लिए चंडीगढ़ गईं दोनों बहनें चिट्टे की गिरफ्त में आ गईं। एक की ओवरडोज से मौत हो गई जबकि दूसरी काउंसलिंग और इलाज के सहारे नशे से बाहर निकलकर जिंदगी की नई शुरुआत करने की कोशिश कर रही है। यह घटना बताती है कि नशे की जड़ केवल लत नहीं, बल्कि अधूरे सपनों, मानसिक दबाव और सामाजिक असुरक्षा का वह संगम है, जो युवाओं को धीरे-धीरे विनाश की ओर धकेल रहा है।
घुमारवीं उपमंडल के एक अत्यंत गरीब परिवार में पिता के देहांत के बाद मां ने मजदूरी कर अपनी दो बेटियों का पालन-पोषण किया। अभावों के बावजूद मां ने दोनों को 12वीं तक पढ़ाने के साथ कंप्यूटर का डिप्लोमा भी कराया। मां की उम्मीद थी कि बेटियां रोजगार कर परिवार की जिम्मेदारी संभालेंगी और गरीबी से बाहर निकालेंगी। करीब पांच साल पहले दोनों बहनें रोजगार की तलाश में चंडीगढ़ चली गईं। शुरुआती दिनों में सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन चंडीगढ़ पहुंचने के कुछ समय बाद बेटियां गलत संगत में पड़ गईं।
दोस्तों के साथ सिर्फ आजमाने के तौर पर शुरू हुआ नशा देखते ही देखते जानलेवा लत में बदल गया। परिवार को बेटियों के व्यवहार में अचानक आए बदलाव, पैसों की बेवजह मांग और कम होती बातचीत से शक हुआ। जब परिवार ने समझाने और इलाज कराने की कोशिश की, तब तक लत काफी गहरी हो चुकी थी।
करीब छह महीने पहले नशे से एक बेटी की जान चली गई। इस घटना ने परिवार को पूरी तरह तोड़ दिया और मां के वर्षों के संघर्ष व सपनों का अंत हो गया। वहीं, बहन की मौत के बाद घर लौटी दूसरी बेटी अभी भी इस लत से उबरने की कोशिश कर रही है। परिवार आर्थिक तंगी के बावजूद उसका काउंसलिंग और डॉक्टरों की सलाह से इलाज करवा रहा है। बेटी दोबारा किसी गलत संगत में न पड़े, इसके लिए मां चौबीसों घंटे साए की तरह उसके साथ रहती है।