बिलासपुर। खून-खून होता है वो न हिंदू होता है और न मुसलमान होता है। दिवंगत कवि साहित्यकार एवं पत्रकार शबीर कुरैशी की 13वीं पुण्य तिथि के उपलक्ष्य में बुधवार को पालिका क्लब बिलासपुर में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी में जब उन्हीं की लिखी उक्त पंक्तियां पढ़ी गईं तो सभी की आंखें नम हो उठीं। संगोष्ठी में उपस्थित कवियों और साहित्यकारों ने पत्र वाचन तथा कविताओं के माध्यम से स्व. शबीर कुरैशी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
17 जुलाई 2006 को स्वर्ग सिधारे स्व. शबीर कुरैशी की 13वीं पुण्य तिथि के उपलक्ष्य में प्रेस क्लब बिलासपुर, अखिल भारतीय साहित्यिक परिषद और कहलूर सांस्कृतिक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में पालिका क्लब में आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी में प्रो. एसके भट्टा ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की।
एसआर आजाद की अध्यक्षता में आयोजित संगोष्ठी में स्व. कुरैशी की धर्मपत्नी आशा कुरैशी, सेवानिवृत्त जिला भाषा अधिकारी डॉ. अनिता शर्मा, कमांडेंट सुरेंद्र शर्मा तथा रतनचंद निर्झर ने विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थिति दर्ज करवाई।
संगोष्ठी के दौरान रामपाल डोगरा, रतनचंद निर्झर, प्रदीप गुप्ता, रविंद्र भट्टा व हुसैन अली ने पत्र वाचन के माध्यम से स्व. कुरैशी का जीवन परिचय देने के साथ ही उनकी खूबियां भी बताई। पत्र वाचन के बाद गीत, गजल और कविता की महफिल सजी। कुलदीप चंदेल ने पहाड़ी कविता कुरैशी तां कुरैशी था न हिंदू न मुसलमान से तां बस इक इंसान था सुनाई। अन्य कवियों और साहित्यकारों ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से कुरैशी को याद किया। उन्होंने कहा कि कुरैशी न केवल बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे बल्कि यारों के यार भी थे। कमजोर वर्ग के लोगों को उनका हक दिलाने में भी वह कभी पीछे नहीं रहे।
यही वजह रही कि दुनिया को अलविदा कहे 13 वर्ष बीत जाने के बावजूद वह आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। कार्यक्रम में डॉ. जयनारायण कश्यप, शिवपाल गर्ग, सुशील पुंडीर, जीतराम सुमन, ओंकार कपिल, डॉ. प्रशांत आचार्य, डॉ. नीरज कंवर, कर्ण चंदेल, अरुण डोगरा, सुमन डोगरा, यासीन मिर्जा, हमीद खान, नरेंद्र गुप्ता, सुरेंद्र गुप्ता, तरुण टाडू व संजय शर्मा आदि ने भी भाग लिया।