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Bilaspur News: जमीन पर अवैध कब्जे और पानी की निकासी मामले में अपील खारिज

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अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने बरकरार रखा निचली अदालत का निर्णय
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कहा-, सह मालिक को अपनी संपत्ति की रक्षा का पूर्ण अधिकार

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घुमारवीं क्षेत्र में जमीन पर अवैध हस्तक्षेप और पानी की निकासी को लेकर चल रहे एक लंबे विवाद में अदालत ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने निचली अदालत की ओर से जारी स्टे ऑर्डर के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संपत्ति के सह मालिक को अपनी भूमि की सुरक्षा करने और उसे नुकसान से बचाने का पूरा कानूनी हक है।
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मामले के अनुसार, ननावां क्षेत्र के एक ग्रामीण (वादी) ने स्थानीय अदालत में मुकदमा दायर किया था। आरोप था कि प्रतिवादी पक्ष उसकी करीब 10 बिस्वा पुश्तैनी जमीन पर अवैध कब्जा करने का प्रयास कर रहा है। शिकायत में कहा गया था कि प्रतिवादियों ने वहां दीवार खड़ी करने के इरादे से निर्माण सामग्री जमा कर ली थी और नींव की खोदाई भी शुरू कर दी थी। इतना ही नहीं, वादी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रतिवादी पक्ष ने अपने घर के गंदे और बरसाती पानी की निकासी के लिए एक नई नाली खोदकर उसका रुख जानबूझकर वादी की जमीन की ओर मोड़ दिया था। दूसरी ओर, अपीलकर्ता (प्रतिवादी) ने इन आरोपों को सिरे से नकारा। उनका तर्क था कि वे केवल उस रास्ते के अधिकार का दावा कर रहे हैं जो उनके घर तक जाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि संबंधित ग्राम पंचायत ने वर्ष 1987 में ही वहां जल निकासी की व्यवस्था की थी और उनकी जमीन ऊंचाई पर होने के कारण पानी स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है। उन्होंने निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए उसे रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और राजस्व रिकॉर्ड का गहन निरीक्षण करने के बाद निष्कर्ष निकाले। कहा कि राजस्व विभाग (पटवारी) की रिपोर्ट के अनुसार, मौके पर नाली का निर्माण हाल ही में किया गया प्रतीत होता है, न कि वर्ष 1987 का। इससे वादी की शिकायत और आशंका को बल मिला। सीनियर सिविल जज घुमारवीं की ओर से अक्तूबर 2022 में जारी किए गए निषेधाज्ञा के आदेश को जिला अदालत ने कानूनन सही पाया। न्यायालय ने कहा कि अस्थायी निषेधाज्ञा के लिए प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति जैसे तीनों अनिवार्य आधार इस मामले में वादी के पक्ष में हैं। अदालत ने अपने फैसले में एक तकनीकी संशोधन भी किया। चूंकि सुनवाई की प्रक्रिया के दौरान एक प्रतिवादी की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश मृत व्यक्ति पर प्रभावी नहीं होगा। हालांकि, अन्य सभी जीवित प्रतिवादियों पर पाबंदियां पहले की तरह ही लागू रहेंगी। अदालत ने अब दोनों पक्षों को 20 अप्रैल, 2026 को ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) में पेश होने के निर्देश जारी किए हैं।
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