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Bilaspur News: बिलासपुर नप चुनाव में कांग्रेस की करारी हार ने खोले अंदरूनी कलह के अध्याय

Mon, 18 May 2026 10:51 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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संगठन में बदलाव न होना बना बड़ा कारण ,अपनों की नाराजगी पड़ी भारी
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पूरे जिले में दिखी कमजोर रणनीति और संगठनात्मक बिखराव

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। बिलासपुर नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस की करारी हार ने जिले की राजनीति में बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस नगर परिषद को लंबे समय तक कांग्रेस का मजबूत आधार माना जाता रहा, वहीं इस बार पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह हार केवल चुनावी नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी, आपसी गुटबाजी और रणनीतिक विफलता का परिणाम है।
नगर निकाय चुनावों में आम तौर पर सत्तारूढ़ सरकार को बढ़त मिलती रही है, लेकिन बिलासपुर नगर परिषद में इस बार तस्वीर उलट दिखाई दी। कांग्रेस कई वार्डों में प्रभावी मुकाबला तक नहीं कर सकी और बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी खुलकर सामने आई। कांग्रेस के भीतर सबसे अधिक चर्चा संगठनात्मक ढांचे को लेकर हो रही है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष लगातार दूसरी बार पद पर बनी हुई हैं। उनके नेतृत्व में पिछली बार भी कांग्रेस को नगर परिषद चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद संगठन में किसी बड़े बदलाव का न होना कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष का कारण बना रहा। सदर ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर भी पार्टी के भीतर विरोध की आवाजें उठती रहीं। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी कर सिफारिशों के आधार पर नियुक्तियां की गईं, जिसका असर बूथ स्तर तक देखने को मिला। कांग्रेस के भीतर टिकट वितरण को लेकर भी भारी नाराजगी रही है। टिकट आवंटन के दौरान कई वरिष्ठ नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को विश्वास में नहीं लिया गया। जिला नेतृत्व और ब्लॉक स्तर पर सीमित दायरे में फैसले होने से पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ा।
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राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि टिकट वितरण के दौरान स्थानीय समीकरणों और कार्यकर्ताओं की राय की अनदेखी ने कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया। कई वार्डों में पार्टी समर्थक अलग-अलग गुटों में बंटे नजर आए। सिर्फ सदर बिलासपुर ही नहीं, बल्कि पूरे जिले में कांग्रेस की कमजोर चुनावी रणनीति और संगठन की एकता का अभाव साफ दिखाई दिया। बूथ स्तर पर तालमेल की कमी, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय का अभाव और स्थानीय नेताओं के अलग-अलग खेमों में बंटने का असर चुनाव परिणामों में स्पष्ट नजर आया।
जिला कांग्रेस अध्यक्ष की संगठन पर कमजोर पकड़ और उनकी कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि यदि समय रहते संगठनात्मक खामियों को दूर नहीं किया गया तो आने वाले पंचायत चुनावों में भी कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि लगातार बढ़ रही अंदरूनी कलह और नेतृत्व के बीच तालमेल की कमी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। बिलासपुर जिला भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा का गृह जिला है। वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की भी इस संसदीय क्षेत्र में मजबूत पकड़ रही है। भाजपा का बूथ स्तर तक मजबूत संगठन और लगातार सक्रिय राजनीतिक नेटवर्क कांग्रेस पर भारी पड़ा। कांग्रेस के भीतर अब हार की समीक्षा की मांग तेज हो गई है। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का मानना है कि यदि समय रहते संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय नहीं बनाया गया, तो आने वाले विधानसभा और पंचायत चुनावों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस को केवल सरकार के भरोसे नहीं, बल्कि मजबूत संगठन, स्पष्ट रणनीति और कार्यकर्ताओं के विश्वास के साथ आगे बढ़ना होगा। बिलासपुर नगर निकाय चुनाव ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता में होने के बावजूद यदि संगठन कमजोर हो, तो राजनीतिक जमीन पैरों के नीचे से खिसक सकती है।
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वहीं इस मामले पर कांग्रेस की जिला अध्यक्ष अंजना धीमान से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश मीडिया कोऑर्डिनेटर संदीप सांख्यान से बात की गई। उन्होंने कहा कि बिलासपुर नगर निकाय चुनाव परिणामों की समीक्षा ब्लॉक, जिला और प्रदेश स्तर पर की जानी चाहिए। साथ ही पार्टी को आत्ममंथन करते हुए संगठनात्मक कमियों और रणनीतिक कमजोरियों पर गंभीरता से विचार करना होगा।
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