एडीजे कोर्ट ने बरकरार रखा झंडूता सिविल कोर्ट का फैसला,कहा- लिखित सहमति के बिना निजी भूमि का उपयोग नहीं कर सकता राज्य
औहर-कोहिना सड़क निर्माण के लिए 17 बिस्वा निजी भूमि का किया गया था उपयोग
सरकार चार दशक से अधिक समय बाद भी नहीं दिखा सकी सहमति या भूमि दान का कोई दस्तावेज
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। औहर-कोहिना सड़क निर्माण के लिए करीब 46 वर्ष पहले उपयोग में लाई गई निजी भूमि के मुआवजे को लेकर चले लंबे कानूनी विवाद में राज्य सरकार को बड़ा झटका लगा है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बिलासपुर की अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए झंडूता की सिविल अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि किसी भी नागरिक की निजी भूमि का उपयोग केवल मौखिक सहमति के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि सरकार किसी सार्वजनिक परियोजना के लिए भूमि लेती है तो उसका विधिवत अधिग्रहण कर उचित मुआवजा देना अनिवार्य है।
मामला झंडूता क्षेत्र के एक गांव में स्थित 17 बिस्वा भूमि से जुड़ा है। वादी ने अदालत में कहा था कि वर्ष 1980 से पहले लोक निर्माण विभाग ने औहर-कोहिना सड़क का निर्माण उसकी भूमि सहित अन्य ग्रामीणों की जमीन पर किया था। उस समय अधिकारियों ने आश्वासन दिया था कि भूमि का अधिग्रहण कर प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया जाएगा। वर्ष 2000 में अधिग्रहण की अधिसूचना भी जारी हुई, लेकिन न तो अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हुई और न ही भूमि का मुआवजा दिया गया। सड़क का निर्माण और डामरीकरण होने के बाद वर्षों से उस पर यातायात जारी है। वादी ने यह भी आरोप लगाया था कि बाद में विभाग ने सड़क के किनारे और कटिंग करने का प्रयास किया, जिसका विरोध करने पर भी अधिग्रहण की कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद उसने अदालत में मुआवजा दिलाने की मांग करते हुए वाद दायर किया। अपील में राज्य सरकार ने दलील दी कि सड़क वर्ष 1980 से पहले ग्रामीणों की मांग पर बनाई गई थी और उस समय भूमि मालिकों ने स्वेच्छा से अपनी जमीन उपलब्ध कराई थी। सरकार का कहना था कि सड़क लगभग 12 किलोमीटर लंबी है और उसके निर्माण पर भारी सरकारी धनराशि खर्च की गई है। साथ ही यह भी कहा गया कि सड़क बनने के समय किसी ने आपत्ति नहीं उठाई, इसलिए अब मुआवजे की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। सुनवाई के दौरान विभाग के अधिकारियों ने अदालत में स्वीकार किया कि सड़क निर्माण के समय वे विभाग में कार्यरत नहीं थे। उन्होंने यह भी माना कि विभाग के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित भूमि मालिकों ने अपनी जमीन स्वेच्छा से दी थी। न तो कोई लिखित सहमति पत्र प्रस्तुत किया गया और न ही मौखिक सहमति का कोई दस्तावेजी प्रमाण अदालत के सामने रखा जा सका। अधिकारियों ने यह भी स्वीकार किया कि संबंधित भूमि का कोई मुआवजा नहीं दिया गया। अदालत ने कहा कि सरकार का पूरा बचाव केवल मौखिक सहमति के दावे पर आधारित है, जबकि उसके समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अचल संपत्ति का हस्तांतरण केवल मौखिक सहमति से नहीं हो सकता। यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि स्वेच्छा से देता है तो उसके लिए विधि सम्मत लिखित दस्तावेज आवश्यक होता है। ऐसे में केवल मौखिक सहमति या मौखिक दान का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। निर्णय में यह भी कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 300-ए प्रत्येक नागरिक को उसकी संपत्ति का अधिकार देता है। किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून की ओर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है। राज्य का दायित्व है कि वह विकास कार्यों में भी कानून का पालन करे और बिना अधिग्रहण तथा मुआवजा दिए किसी की भूमि का उपयोग न करे। अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि सड़क बने चार दशक से अधिक समय बीत चुका है, इसलिए दावा समय-सीमा से बाहर है। न्यायालय ने कहा कि जब तक बिना अधिग्रहण और मुआवजा दिए भूमि का उपयोग जारी है, तब तक यह निरंतर उत्पन्न होने वाला कारण है और ऐसे मामलों में केवल समय बीत जाने के आधार पर भूमि मालिक का अधिकार समाप्त नहीं होता। सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया और झंडूता की सिविल अदालत के पूर्व निर्णय को बरकरार रखा। अदालत ने दोनों पक्षों को अपने-अपने मुकदमे का खर्च स्वयं वहन करने के निर्देश भी दिए।