बड़गांव के गटी गांव में चल रही श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन मौजूद लोग । संवाद
भक्ति से परमात्मा को पाने का है मार्ग सत्संग
संवाद न्यूूज एजेंसी
बरठीं (बिलासपुर)। बड़गांव के गटी गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथावाचक पंडित गोपाल स्वरूप शास्त्री ने कहा कि सत्संग जितना मिले, उतना ही कम है। बार-बार के अभ्यास से अनुबंध बढ़ता है। उन्होंने कहा कि सत्संग नाम संगति का है। संगति इंसान को बनाती भी है और बिगाड़ती भी है। रामायण में भी तुलसीदास ने लिखा है सठ सुधरी सत संगत पावा। यानी अच्छी संगत मिलने से मूर्ख भी सुधर कर ज्ञानी बन जाता है।
सत्संग के महत्व को समझाते हुए कहा कि सत्संग समाज का अंग है न कि समाज का विरोध है। सत्संग भक्ति के चेतन स्वरूप से रूबरू करवाता है। सत्संग में आने का यह अर्थ नहीं है कि आप मूर्ति पूजा छोड़ दो। सत्संग केवल यही बताता है कि एक तत्व की मूर्ति आपको कुछ दे नहीं सकती न ही वो आपको वो मार्ग को सुझा सकती है,जो भक्ति का परमात्मा को पाने का मार्ग है। संतमत गुरु की भक्ति का मार्ग है और गुरु ही हमें अज्ञान से ज्ञान की और लेकर जा सकता है। संतमत करनी का मत है न कि बुद्धि विचार का। अच्छाई हमेशा अपने आप से शुरू होती है। घर में ही इंसान की पहली गुरु मां के रूप में बैठी है। गुरु महाराज ने बताया कि आपके ओर से किया कर्म भी दर्ज हो रहा है। भजन जवानी में करना चाहिए बुढ़ापा किसने देखा है।