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मां रत्नो से किया वादा निभाने चैत्र माह में शाहतलाई आते हैं पौणाहारी

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बाबा बालक नाथ की तपोस्थली शाहतलाई में दर्शन करने के कतारों में खड़े श्रद्धालु। - फोटो : BILASPUR
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शाहतलाई (बिलासपुर)। शाहतलाई का इतिहास विश्वविख्यात योगी एवं तपस्वी बाबा बालक नाथ से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार गुरु दत्तात्रेय के शिष्य बाबा बालक नाथ (पौणाहारी) ने शाहतलाई में 12 साल तक मां रत्नो की गायें चराई थीं। इस स्थान को छोड़ते समय उन्होंने वादा किया था कि वह हर साल चैत्र माह में शाहतलाई आएंगे। यही वजह है कि चैत्र माह में यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
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चैत्र मेलों में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन करने के लिए यहां पहुंचते हैं। मंदिर न्यासी विजय कुमार शर्मा ने बताया कि मान्यताओं के अनुसार बाबा बालक नाथ गुजरात के जूनागढ़ से भगवान शिव के दर्शन करने के लिए शाहतलाई आए थे। यहां वह मां रत्नो की गायें चराते थे। इसके एवज में उन्हें रोटियां और छाछ (लस्सी) मिलती थी। गायें चरती रहती थीं और बाबा बालक नाथ वट वृक्ष के नीचे बैठकर भक्ति में लीन रहते थे। यह सिलसिला लगातार 12 वर्ष तक जारी रहा। एक दिन बाबा तपस्या में मग्न थे। इसी दौरान गायों ने किसानों की फसल खा ली। किसानों ने मां रत्नो के पास जाकर शिकायत कर दी। किसानों की बातों में आकर मां रत्नों ने बाबा बालक नाथ को भला बुरा कहा। यहां तक कि उन्हें रोटियों और छाछ का ताना भी दे दिया। मां रत्नों की बातें शांत स्वभाव से सुनने के बाद बाबा ने वट वृक्ष के खोल में रखीं 12 वर्षों की रोटियां और छाछ से भरा तालाब उन्हें दिखा दिया। तब कहीं जाकर मां रत्नो को बाबा बालक नाथ के दिव्य पुरुष होने का अहसास हुआ। उन्होंने बाबा से क्षमा याचना की, लेकिन बाबा उस स्थान को त्यागकर धौलगिरी पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित गुफा में चले गए। दियोटसिद्ध में स्थित यह पवित्र गुफा एक धर्मिक स्थल के रूप में विश्वविख्यात है। बाबा बालक नाथ ने मां रत्नो से वादा किया था कि वे हर साल चैत्र माह में शाहतलाई आएंगे। इसलिए चैत्र माह में शाहतलाई में मेले का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि चैत्र माह में बाबा के दरबार में हाजिरी लगाकर रोट चढ़ाने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। शाहतलाई का समूचा क्षेत्र इन दिनों रोशनी से नहा रहा है। समय के साथ मेले के स्वरूप में भी परिवर्तन आया है। पूर्व में अधिकांश श्रद्धालु पूरा माह अथवा एक सप्ताह शाहतलाई में डेरा जमाए रखते थे। भजन कीर्तन कर सुबह-शाम की आरती में भाग लेते थे।
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