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Bilaspur News: जमीन के विवाद में अपील खारिज, ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार

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अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने सुनाया फैसला, अपंजीकृत अदला-बदली डीड को नहीं माना आधार
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बंटवारा होने तक विवादित भूमि पर निर्माण और कब्जे में हस्तक्षेप पर रोक जारी रहेगी

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घुमारवीं के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत ने 16 वर्ष पुराने भूमि विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए प्रतिवादी पक्ष की सिविल अपील खारिज कर दी। अदालत ने 12 मार्च 2020 को सिविल जज कोर्ट नंबर-2, घुमारवीं द्वारा सुनाए गए फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि विवादित भूमि में वादी पक्ष का एक-तिहाई हिस्सा राजस्व रिकॉर्ड से सिद्ध है और अपंजीकृत एक्सचेंज (अदला-बदली) डीड के आधार पर उस अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
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मामला वर्ष 2013 में दायर एक सिविल वाद से जुड़ा था। वादी पक्ष का कहना था कि विवादित भूमि में उनके परिवार का एक-तिहाई हिस्सा है, जिस पर उनके पूर्वज ने मकान भी बनाया था। आरोप था कि प्रतिवादी पक्ष बिना कानूनी बंटवारे के उस भूमि पर कब्जा कर निर्माण करना चाहता है। इस पर ट्रायल कोर्ट ने वादी पक्ष के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें संयुक्त स्वामी एवं कब्जाधारी घोषित किया था और प्रतिवादी पक्ष को भूमि पर निर्माण करने या उसकी प्रकृति बदलने से रोक दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए प्रतिवादी पक्ष ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत में अपील दायर की। अपील में कहा गया कि वर्ष 2007 में दोनों पक्षों के बीच पारिवारिक सहमति से भूमि की अदला-बदली हो चुकी थी और इसके लिए पंजीकरण आवश्यक नहीं था। साथ ही यह भी दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया। अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने पाया कि कथित एक्सचेंज डीड केवल फोटोकॉपी के रूप में पेश की गई थी। उसका कभी पंजीकरण नहीं कराया गया और न ही उसके आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में कोई बदलाव करवाया गया। अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में भूमि का आदान-प्रदान हुआ होता तो संबंधित पक्ष तत्काल राजस्व अभिलेखों में परिवर्तन करवाते, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 100 रुपये से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति के आदान-प्रदान के लिए पंजीकृत दस्तावेज अनिवार्य है। अपंजीकृत एक्सचेंज डीड संपत्ति के स्वामित्व का आधार नहीं बन सकती और केवल ऐसे दस्तावेज के आधार पर किसी के वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते। इन सभी तथ्यों के आधार पर अदालत ने प्रतिवादी पक्ष की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि विवादित भूमि का विधिक बंटवारा होने तक प्रतिवादी पक्ष न तो वहां निर्माण करेगा और न ही वादी पक्ष के कब्जे एवं अधिकार में किसी प्रकार का हस्तक्षेप करेगा।
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