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Bilaspur News: जन्मतिथि में हेरफेर कर सरकारी लाभ लेने के मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत

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अदालत बोली जांच में सहयोग कर रहा आरोपी, हिरासत में लेने की जरूरत नहीं
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घुमारवीं की अतिरिक्त सत्र अदालत ने जन्मतिथि में कथित तौर पर बदलाव कर सरकारी सेवा में लाभ लेने के मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपी जांच में शामिल हो चुका है और जांच एजेंसी की ओर से आवश्यक कार्रवाई पूरी की जा चुकी है। ऐसे में आरोपी को हिरासत में लेने की आवश्यकता नहीं है।
यह मामला पुलिस थाना भराड़ी में दर्ज एक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें आरोपी पर सरकारी रिकॉर्ड में जन्मतिथि को लेकर कथित हेरफेर करने, धोखाधड़ी करने, विश्वास का गलत इस्तेमाल करने और दस्तावेजों में कूटरचना करने के आरोप लगाए गए थे। मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी लोक निर्माण विभाग में बेलदार के पद पर तैनात था। नियुक्ति के समय जन्मतिथि संबंधी रिकॉर्ड में कथित रूप से बदलाव कर वास्तविक जन्मतिथि के स्थान पर दूसरी जन्मतिथि दर्ज करवाई गई। आरोप यह भी था कि ग्राम पंचायत बरोटा के पारिवारिक रजिस्टर में भी कथित तौर पर छेड़छाड़ कर रिकॉर्ड में बदलाव किया गया। शिकायतकर्ता ने इस मामले को लेकर पहले पुलिस और अन्य अधिकारियों को शिकायत दी थी। अदालत में आरोपी पक्ष ने दलील दी कि मामला पारिवारिक विवाद के कारण दर्ज करवाया गया है और आरोप निराधार हैं। आरोपी ने जांच में पूरा सहयोग करने और अदालत की ओर से लगाई जाने वाली सभी शर्तों का पालन करने की बात कही।
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अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि जांच एजेंसी आरोपी के हस्ताक्षर और लिखावट के नमूने ले चुकी है। आरोपी पहले ही जांच में शामिल हो चुका है और उसके खिलाफ अंतरिम जमानत की शर्तों के उल्लंघन का कोई तथ्य सामने नहीं आया है।
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अदालत ने कहा कि जमानत का उद्देश्य आरोपी की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है, न कि मुकदमे की शुरुआत से पहले उसे दंडित करना। अदालत ने माना कि मामले में आरोपी की वास्तविक भूमिका का पता जांच पूरी होने और आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद ही चल सकेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर अभियोजन पक्ष इसे रद्द करवाने के लिए अदालत का रुख कर सकता है। यह आदेश केवल जमानत आवेदन के निपटारे तक सीमित रहेगा और मामले के अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेगा।
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