निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दोषी ने की थी अपील
पूर्व के फैसले को सही ठहराते हुए अदालत ने अपील की खारिज
सजा भुगतने के लिए तुरंत कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने के दोषी को दिए आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की एक अदालत ने चेक बाउंस के मामले में निचली अदालत की ओर से सुनाई गई सजा को बरकरार रखा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं (कैंप बिलासपुर) ने दोषी की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए उसे तीन महीने के कारावास और 30,000 रुपये मुआवजे की सजा को उचित ठहराया है।
यह कानूनी विवाद साल 2012 से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने अपने परिचित को जून 2012 में जरूरत पड़ने पर 30,000 रुपये उधार दिए थे। इस राशि को लौटाने के लिए दोषी ने 30 दिसंबर 2012 की तारीख का एक चेक जारी किया था। जब शिकायतकर्ता ने इस चेक को बैंक में लगाया, तो यह खाते में अपर्याप्त राशि होने के कारण बाउंस हो गया। इसके बाद कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद भुगतान न होने पर शिकायतकर्ता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। 25 सितंबर 2024 को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट घुमारवीं कोर्ट नंबर 1 ने व्यक्ति को दोषी पाते हुए तीन महीने का साधारण कारावास और 30,000 रुपये मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया था। दोषी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि उसने केवल 10,000 रुपये उधार लिए थे और 20,000 रुपये पहले ही लौटा दिए थे। उसने यह भी दावा किया कि उसने शिकायतकर्ता के पिता को चेक सुरक्षा के तौर पर दिया था, जिसका दुरुपयोग किया गया। हालांकि, सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पाया कि आरोपी के बयान और उसके गवाह की गवाही में काफी विरोधाभास था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत यह माना जाता है कि चेक कानूनी देनदारी चुकाने के लिए ही दिया गया है, जिसे आरोपी झुठला नहीं सका। यदि चेक का दुरुपयोग हुआ था, तो आरोपी ने उसे वापस लेने के लिए कोई कानूनी कार्रवाई या नोटिस क्यों नहीं दिया? अंतिम निर्णय में अदालत ने माना कि निचली अदालत का फैसला पूरी तरह न्यायसंगत है। अपील खारिज करते हुए अदालत ने दोषी को आदेश दिया है कि वह सजा भुगतने के लिए तुरंत कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करे।