संस्कृत, हिंदी और पहाड़ी बोलियों में कवियों ने सुनाईं रचनाएं, बृज लाल लखनपाल और गायत्री शर्मा सम्मानित
भाषा एवं संस्कृति विभाग ने बिलासपुर में किया मासिक गोष्ठी का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। भाषा एवं संस्कृति विभाग ने बिलासपुर में मासिक गोष्ठी एवं बहुभाषी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम साहित्यकार/कलाकार से मिलिए कार्यक्रम और संस्कृत सप्ताह के तहत आयोजित हुआ। जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि मंच संचालन सुरेंद्र मिन्हास ने किया।
कार्यक्रम दो सत्रों में हुआ। पहले सत्र में साहित्यकार बृज लाल लखनपाल का जीवन वृत्त एवं कृतित्व शमशेर सिंह चंदेल ने तथा गायत्री शर्मा का जीवन वृत्त एवं कृतित्व शीला सिंह ने प्रस्तुत किया। दोनों साहित्यकारों को साहित्य, समाजसेवा और मानवीय मूल्यों के क्षेत्र में योगदान के लिए डायरी, पेन, मफलर और टोपी भेंटकर सम्मानित किया गया।
दूसरे सत्र में बहुभाषी कवि सम्मेलन हुआ। इसमें साहित्यकारों और कवियों ने हिंदी, संस्कृत और स्थानीय बोलियों में रचनाएं प्रस्तुत कीं। रविंद्र कुमार शर्मा ने शहर की जिंदगी पर आधारित रचना प्रस्तुत की। संदेश शर्मा ने संस्कृत श्लोक, जबकि जीत राम सुमन ने शहर में बढ़ती दूरियों और अपनेपन की कमी को रचना के माध्यम से सामने रखा। शीला सिंह ने उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः श्लोक प्रस्तुत किया। डॉ. अनेक राम सांख्यान, अमर नाथ धीमान, अनूप सिंह मस्ताना, राम पाल डोगरा, सुरेंद्र मिन्हास, शिवपाल गर्ग और कर्मवीर कंडेरा ने भी अपनी रचनाएं सुनाईं। वहीं सुषमा खजूरिया ने देशभक्ति रचना, सीता जसवाल ने धरती और वर्तमान संकट पर कविता तथा अरुण डोगरा ऋतु ने जीवन के प्रति आशावादी भावों को कविता में पिरोया। शमशेर सिंह चंदेल ने रिश्तों पर रचना प्रस्तुत की। बृज लाल लखनपाल ने भारत के सम्मान और वैभव को लेकर रचना सुनाई। केशव शर्मा ने भारतीय संस्कृति की आत्मा संस्कृत विषय पर लेख प्रस्तुत किया। इंद्र सिंह चंदेल ने पहाड़ी गीत, सुमन चड्डा ने जिंदगी पर रचना और गायत्री शर्मा ने कविता प्रस्तुत की। डॉ. जय महलवाल ने संस्कृत के प्रति लोगों की रुचि और बोलचाल में इसके कम होते प्रयोग पर रचना सुनाई। बाबू राम धीमान ने पहाड़ी रचना प्रस्तुत की। इस मौके पर जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने कहा कि संस्कृत समृद्ध सांस्कृतिक एवं ज्ञान परंपरा की आधारशिला है। भारतीय भाषाओं और बोलियों की विविधता हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के साथ बहुभाषी साहित्यिक आयोजनों से विभिन्न भाषाओं और बोलियों के साहित्य को मंच मिलता है।