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गोबिंदसागर में 4 साल में गिरा 50 फीसदी मछली उत्पादन

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बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन निर्माण के कारण नदी, नालों और गोबिंद सागर में की जा रही अवैध डंपिंग के कारण मछली उत्पादन पर असर पड़ा है। 2014 के बाद के सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो चार सालों में हर साल मछली का उत्पादन गिरता जा रहा है। इसका खुलासा फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति को दी गई सूचना से हुआ है। चार साल में उत्पादन करीब 50 फीसदी गिरा है। अब समिति इस दस्तावेज को भी एनजीटी में साक्ष्य के रूम में पेश करेगी, ताकि नदी, नालों में हो रही डंपिंग को रोका जा सके।
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मत्स्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार गोबिंद सागर में लगातार मछली का उत्पादन हर साल गिर रहा है। अपनी रिपोर्ट में विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 2014 में 1492174 किलो ग्राम मछली उत्पादन हुआ था। जबकि 2015 में उत्पादन घटकर 1061635.900 किलोग्राम रह गया। इसके बाद साल 2016 में उत्पादन 858782.100 किलोग्राम तक पहुंच गया। साल 2017 में गोबिंद सागर में मछली उत्पादन 745649.500 किलोग्राम तक रह पाया। आंकड़ों से साफ होता है गोबिंद सागर में इन चार सालों में मछली का उत्पादन आधा हो गया है। इस कारण जिले के करीब तीन हजार मछुआरों के परिवारों पर आर्थिक संकट खड़ा होने लगा है।
इसकी पुष्टि सहायक निदेशक मत्स्य श्याम लाल शर्मा के कार्यालय से जारी हुए पत्र संख्या फिश (एफ)-10-16/2017-डी-775 ने की है। वहीं मत्स्य विभाग ने यह भी कहा है कि मक डंपिंग से मत्स्य उत्पादन गिर रहा है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
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मत्स्य विभाग के पत्र संख्या फिश (एफ)-10-23/2018-डी-355 के तहत 21 फरवरी को चीफ इंजीनियर बीबीएमबी को पत्र लिखकर बताया था कि फोरलेन निर्माण से गोबिंदसागर और सहायक नदियों में मिट्टी गिर रही है। इससे मत्स्य उत्पादन और जलाशय के जलस्तर पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इस पर कार्रवाई की जाए। लेकिन, इस पत्र के बाद भी अभी तक कोई कार्रवाई अमल में नहीं लाई जा सकी है।
फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के उपप्रधान राकेश कुमार, चिंता देवी, जगदीश राम और महासचिव मदन शर्मा ने बताया कि मछली उत्पादन से मछुआरों पर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। समिति मामले को लंबे समय से उठाती आ रही है। लेकिन, अब इस दस्तावेज को एनजीटी में पेश किया जाएगा।
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