अमर उजाला ब्यूरो
भराड़ी (बिलासपुर)। घुमारवीं उपमंडल के तहत शिमला-हमीरपुर नेशनल हाईवे के किनारे धार पर बसे पन्याली, डोहरु, मरयाणी गांव के लोगों को सड़क सुविधा न मिलने से नारकीय जीवन जीने पर विवश होना पड़ रहा है। आज भी इन गांव में अगर कोई बीमार हो जाए तो पालकी का सहारा लेना पड़ता है।
रविवार को घर में काम कर रही पन्याली गांव की सोमा देवी अचानक गिर गई। उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट लग गई। घायल महिला को मुख्य सड़क तक पहुंचाने के लिए पालकी का सहारा लेना पड़ा। करीब चार किलोमीटर तक महिला को पालकी पर लाया गया। यह कोई पहला वाक्या नहीं हैं जब इस तरह से घायल या बीमार लोगों को पालकी के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया हो। इससे पहले भी कई बार ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। इस संदर्भ में स्थानीय लोगों ने कई बार विभाग, प्रशासन व नेताओं के सामने अपनी मांग रखी है लेकिन मात्र आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला है।
जंगल के बीचोंबीच बसे इन गांवों के करीब 300 से अधिक परिवार रहते हैं, जोकि सड़क सुविधा न होने से रोजाना 4 से 5 किलोमीटर की उतराई उतरकर पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचते हैं। स्कूल व कॉलेज जाने वाले छात्रों के लिए रोजाना मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर लड़कियों को जंगल से होकर देर सवेर दिक्कतें पेश आती हैं।
ग्रामीण कृष्ण सिंह, धर्म सिंह, सुरेश पन्याली, शमशेर सिंह, राज कुमार, मदन, पुष्पा, रीता, माया, बाबूराम, इंद्र सिंह, दिलाराम, सुरेश, राकेश, ईश्वर सिंह, प्रकाश, कुलदीप ने बताया कि इन गांव के लिए कुछ वर्ष पहले स्थानीय लोगों ने विभाग की मदद से कच्ची सड़क का निर्माण किया था लेकिन आज तक वह सड़क पक्की ना हो सकी। इस वजह से वह कच्ची सड़क भी उखड़ कर बर्बाद हो चुकी है व कोई भी वाहन वहां से नहीं चल पाता है।
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दो साल पहले तेंदुए के हमले से मरा था ग्रामीण
यह वही इलाका हैं, जहां पर करीब दो साल पहले राह चलते एक व्यक्ति पर तेंदुआ झपटा था जिससे उसकी मौत हो गई थी। बाद में शूटरों को बुलाकर तेंदुए को मारा गया था। आज भी रात के समय लोगों को जान जोखिम में डालकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है। यही डर लगा रहता है कि कभी भी कोई तेंदुआ हमला न कर दे।