बिलासपुर। प्रेस क्लब में शुक्रवार को मासिक साहित्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें सीआरपीएफ के सेवानिवृत्त कमांडेंट सुरेंद्र शर्मा ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। सुखराम आजाद ने संगोष्ठी की अध्यक्षता की। रविंद्र भट्टा ने मंच संचालन किया। सर्वप्रथम आकाशवाणी शिमला में कई दशकों तक बिलासपुरी कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले शांति गौतम के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी गई।
इसके बाद प्रदीप गुप्ता ने प्रसिद्ध साहित्यकार मुद्राराक्षस के व्यक्तित्व व कृतित्व पर पत्र वाचन किया। कुलदीप चंदेल ने बिलासपुर का राजनीतिक इतिहास विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत किया। तदोपरांत कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। हुसैन अली ने वर्तमान राजनीति पर तंज कसते हुए देखकर रैलियों के तमाशे, भृकुटि तन गई है बस्तियों की, पत्थर में कमी है, वह पिघलता नहीं, पर खासियत है कि वह बदलता नहीं कविता पेश की।
शिवपाल गर्ग ने लगी लोका रे गलाए तू, ऐडी थी न तू, रूकमणी दिल तोड़या आसांदा, किन्हा जन्मा री थी दुश्मनी पहाड़ी कविता सुनाई। ओंकार कपिल ने बुझते हुए दीपक का दर्द बयान करते हुए कहा कि किसी ने तेल से जलाया मुझे, किसी ने घी डाला, सदियों से जलता आया हूं, कितना जलाओगे और मुझे।
अमर नाथ धीमान ने विरह की गजल सुनाते हुए कहा कि किसी के विरह में कैसे दिन हैं गुजारे चोट खाई गहरी है, किस्मत के मारे। डॉ. जय नारायण कश्यप की कविता की पंक्तियां थी मेरा प्रणय बाजार नहीं, मेरा उदय व्यापार नहीं, समर्पण है मगर प्रिय को, मेरा अभिसार प्रिय के लिए है। प्रदीप गुप्ता की गजल की पंक्तियां थीं कि अपने आईने से चोट खाते हैं लोग, शमशान को कितना सजाते हैं यहां के लोग, कल बीच चौराहे से अगवाकर लिया था लड़की को, खामोश खड़े रहे यहां के लोग।
इंदेश शर्मा ने पहाड़ी कविता मुर्गा प्यागा-प्यागा बांग देंदा था, कोई कुडौलू चक्की पाणीं जो जांदा था। कुलदीप चंदेल ने तियां पढ़ी लिखी डॉक्टर, इंजीनियर, एसपी, डीसी बणयां करदियां मां बुढे़यां रा नाम रोशन करदिंया कविता सुनाई। सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि औरतां रे जात चलदे मांणुआ जो मौही लेंदी कविता सुनाई। इस अवसर पर डॉ. बीआर शर्मा व नवल किशोर भी उपस्थित रहे।