अमर उजाला ब्यूरो
बिलासपुर।
जिला अस्पताल के निजी वार्डोें की हालत दयनीय है। यहां पर कई कमरों मेें खिड़कियां टूटी हैं, तो कई जगहों पर अलमारियां टूट-फूट चुकी हैं। जिस कारण कई कमरों को बंद रखा गया है। जबकि कई वार्डों में खिड़कियों के शीशे टूटे होने से ठंड में मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जबकि निजी वार्ड में मरीजों को एक दिन का 300 से 600 रुपये तक का शुल्क देना पड़ रहा है।
स्पेशल वार्ड में ठहरने वाले मरीज और उसके साथ आने वाले तीमारदारों को किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होती। तीमारदार मरीज को किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिए वह स्पेशल वार्ड में उसे भर्ती करवा उपचार करवाना उचित समझता है। लेकिन जिला अस्पताल में स्पेशल वार्डों की ही हालत खस्ता है। यहां पर कई जगहों पर खिड़कियां टूटी हुई हैं, तो कई कमरों की अलमारियां भी टूट चुकी हैं। इससे ज्यादातर कमरे खाली हैं। जिन कमरों में मरीज थे उनकी हालत कुछ हद तक ठीक थी, लेकिन ज्यादातर कमरे खस्ता हैं। इससे कुछ मरीजों को यहां पर स्पेशल वार्ड नहीं मिल पा रहे हैं।
अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि वार्डों की खस्ताहाल का मुख्य कारण बंदर हैं। वे कमरों में घुस कर उत्पात मचाते हैं। बंदरों ने कई कमरों की सीलिंग तोड़ दी है। जबकि खिड़कियां भी टूटी हुई हैं। अभी दो माह पहले ही अस्पताल प्रबंधन की ओर से यहां पर टूटी खिड़कियों और सीलिंग को दुरुस्त किया गया था। लेकिन दो माह बाद ही वार्ड फिर खस्ता हो गए हैं।
सीएमओ बिलासपुर वीके चौधरी का कहना है कि मामला उनके ध्यान में है। इस बारे में जल्द ही आला अधिकारियों से बात की जाएगी। बजट का प्रावधान कर खस्ताहाल वार्डों को दुरुस्त किया जाएगा।
स्पेशल वार्ड और सामान्य वार्ड में अंतर
1. स्पेशल वार्ड में एक-एक मरीज अकेला रहता है, जबकि सामान्य वार्ड में एक साथ कई मरीज रहते हैं।
2. स्पेशल वार्ड में मरीज के साथ एक साथ कई तीमारदार रह सकते हैं, जबकि सामान्य वार्ड में एक से ज्यादा नहीं रह सकता।
3. स्पेशल वार्ड में हर टेस्ट का शुल्क लिया जाता है, जबकि सामान्य वार्ड में कुछ नि:शुल्क हैं।
4. सरकार से मिलने वाली नि:शुल्क दवाइयों के अलावा अन्य दवाइयों का खर्चा स्पेशल वार्ड में लिया जाता है, जबकि सामान्य वार्ड में बीपीएल, एपीएल व अन्य पात्र मरीजों को दवाइयां नि:शुल्क दी जाती है।