पद्मश्री के लिए चयनित बिलासपुर के हरिमन शर्मा के संघर्ष की कहानी लंबी है। उन्होंने आठ साल के शोध के बाद एचआरएमएन 99 किस्म को तैयार कर 40 से 46 डिग्री वाली भीषण गर्मी में सेब उत्पादन को सफल बनाया। शर्मा ने आम पर कोहरे की मार पड़ने के बाद सेब उत्पादन को वैकल्पिक रूप में चुना। उन्होंने इस पर 1999 शोध शुरू किया।
साल 2007 में उन्हें इस किस्म को तैयार करने में सफलता मिली। इसके बाद उन्होंने बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, ऊना, मंडी, सोलन के बागवानों से पौधे रोपित करवाए। हरिमन शर्मा की सफलता ने हिमाचल प्रदेश और भारत सरकार का ध्यान आकर्षित किया। उन्हें हिमाचल प्रदेश सरकार के एकीकृत उद्यान विकास मिशन और डॉ. वाईएस परमार वानिकी एवं उद्यानिकी विश्वविद्यालय नौणी सोलन की राज्य स्तरीय कार्यकारिणी समिति में सदस्य बनाया गया। उनकी प्रेरणा से विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने एचआरएमएन 99 पर शोध किया। इसके बाद इस किस्म को विदेशों में भेजने का सिलसिला भी शुरू हुआ।
वैकल्पिक रूप से चुना सेब का उत्पादन हरिमन शर्मा को आज पद्मश्री तक ले आया है। सेब की एचआरएमएन 99 किस्म के 14 लाख पौधे आज देश के सभी राज्यों सहित जर्मनी, बांग्लादेश, नेपाल भेज जा चुके हैं। विदेशों यह किस्म सफलतापूर्वक फल दे रही है। इसी साल उन्होंने 7 हजार पौधे ओमान भेजे हैं। हरिमन शर्मा सेब के अलावा अपने बगीचे में आम, कीवी और अनार के पेड़ भी लगाते हैं। हरिमन शर्मा को उनके कार्यों के लिए 15 राष्ट्रीय पुरस्कार, 10 राज्य स्तरीय पुरस्कार और कई अन्य सम्मान प्रदान किए गए हैं।