संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। जिले से खैर की तस्करी का नेटवर्क आसपास के कई राज्यों में फैला हुआ है। खैर की लकड़ी में कई औषद्यीय गुण होते हैं। पान के साथ खाया जाने वाला कत्था भी खैर से ही तैयार होता है। इसके चलते खैर की लकड़ी की बाजार में अधिक मांग रहती है। दिल्ली, पंजाब और हिमाचल तक तस्करों का पूरा नेटवर्क काम कर रहा है।
यमुनानगर जिला तीन राज्यों की सीमा पर स्थित है। यहां से उत्तराखंड, यूपी, हिमाचल की सीमाएं लगती हैं। साथ ही दिल्ली और पंजाब भी नजदीक है। यही कारण है कि यमुनानगर के जंगलों में खैर की तस्करी सबसे अधिक होती है। जानकारों का कहना है कि खैर की लकड़ी को फैक्ट्री प्रोसेस कर तेल निकाला जाता है और उसके बाद लकड़ी का कत्था बनाया जाता है।
इसका प्रयोग चूने के साथ पान खाने में किया जाता है। इसके साथ ही खैर का तेल बहुत महंगे दामों पर बिकता है और औषधियों में प्रयोग किया जाता है। इन्हीं औषधीय गुणों के कारण हिमाचल, पंजाब और दिल्ली की आजाद नगर मंडी में खैर की लकड़ी की मांग रहती है। तस्कर जंगल से लकड़ी काटकर यमुना नदी पार कर यूपी की सीमा में पहुंच जाते हैं। इसके साथ ही हिमाचल और पंजाब में भी आसानी से पहुंच है। वहां से दिल्ली और अन्य राज्यों में लकड़ी पहुंचा दी जाती है।
खैर की लकड़ी को दो तरह से बेचा जाता है। एक छिलके के साथ और दूसरा छिलके के बिना। लकड़ी जितनी पुरानी होती है उतना रेट भी अच्छा मिलता है। बताया जाता है कि बाजार में खैर की लकड़ी पांच से सात हजार रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से बिक जाती है। यही नहीं एक पेड से पांच से 10 कुंतल लकड़ी आसानी से मिल जाती है।