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प्रभु कृपा का आधार बनता है निश्चल प्रेम : ऊषा भारती

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संवाद न्यूज एजेंसी
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जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में रविवार को साप्ताहिक सत्संग करवाया गया। इस अवसर पर आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी ऊषा भारती ने भक्ति पथ पर प्रेम का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि पवित्रता को पाने के लिए प्रेम भी निश्चल एवं पवित्र होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रेम के बिना जीवन नीरस होता है। प्रत्येक जीव को प्रेम पाने की चाहत होती है और प्रभु भी प्रेम के वशीभूत होते हैं। यहां विचार करें कि सांसारिक प्रेम में वह आकर्षण हो सकता है जो इस अखंड ब्रम्हांड में निहित है। असीम को पाने के लिए प्रेम भी असीम होना चाहिए। संत महापुरुष कहते हैं कि प्रभु के चरणों में समर्पण किए बिना शुद्ध प्रेम का रसास्वादन नहीं किया जा सकता। प्रेम वह भाव है जो हमारी अंतरात्मा को पुलकित करता है और उसकी सुगंध से हमारे आसपास का वातावरण भी महक उठता है।
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ऐसे दिव्य प्रेम में सराबोर एक भाग्यशाली आत्मा प्रकृति के कण कण से ही प्रेम करती है। उसका प्रेम असीम हो जाता है। संसार में जिसे प्रेम कहा जाता है वह प्रेम का वीभत्स रूप होता है जहां केवल मोह और स्वार्थ के बवंडर होते हैं। जिनमें इंसान की मानसिक शांति एवं उसके सद्गुणों का क्षय हो जाता है। प्रेम वह स्वाति बूंद की तरह है जो अपने स्थान के साथ अपना स्वभाव भी परिवर्तित कर देती है। स्वाति बूंद सर्प के मुख में जाती है तो विष का रूप धारण करती है, सीप के मुख में जाती है तो वह मोती बन जाती है।
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केले के पत्ते में जाए तो वह कपूर बन जाती है। इसी प्रकार जब प्रेम की भावना इस नश्वर संसार से जुड़ती है तो वह हमें स्वार्थी और अहंकारी बना देती है। यदि प्रेम गुरुदेव के चरणों में और प्रभु की भक्ति में लग जाए तो वह हमारे मोक्ष और बंधनों से छूटने का आधार बन जाता है। गुरु के चरणों में प्रीत वह अनमोल निधि है जिसे प्राप्त करके हम अखंड एवं शाश्वत आनंद को प्राप्त करते हैं।
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