संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बृजपाल छप्पर के पार्टी छोड़ कर बहुजन समाज पार्टी में शामिल होने और प्रत्याशी बनाए जाने से साढौरा विधानसभा सीट पर समीकरण बदल गए हैं। बृजपाल के बसपा में जाने से कांग्रेस नेताओं की टेंशन बढ़ गई है। लोगों ने भी हार जीत को लेकर भी कयास लगाने शुरू कर दिए हैं। अब यहां मुकाबला रोचक हो गया है।
पहले लोग साढौरा सीट पर मुख्य मुकाबला पहले रेनू बाला और भाजपा प्रत्याशी बलवंत सिंह के बीच मान रहे थे। वहीं काफी लोग अब बृजपाल छप्पर व बलवंत सिंह के बीच मुकाबला मान रहे हैं। समीकरण जोड़ तोड़ कर लोग तीनों की ही जीत के दावे कर रहे हैं। बृजपाल छप्पर की पत्नी पिंकी छप्पर साढौरा विधानसभा सीट पर वर्ष 2014 में इनेलो के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं।
तब भी उनके सामने भाजपा के प्रत्याशी बलवंत सिंह थे। उस चुनाव में बलवंत सिंह को कुल 63772 वोट मिले थे। पिंकी छप्पर को 49626 वोट मिले थे। पिंकी छप्पर बलवंत सिंह से 14146 वोट से हार गई थीं। इसके बाद बृजपाल व पिंकी दोनों ही इनेलो छोड़ कर पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस में शामिल हो गए।
2019 के चुनाव में साढौरा सीट से बृजपाल छप्पर का टिकट पक्का माना जा रहा था, लेकिन उसी दौरान रेनू बाला की भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में एंट्री हो गई। सैलजा समर्थक होने के कारण रेनू बाला को टिकट मिल गया। बृजपाल छप्पर को अगली बार टिकट मिलने के आश्वासन से ही संतोष करना पड़ा। इस बार भी रेनू बाला टिकट हासिल करने में सफल रहीं।
साढौरा सीट पर कांग्रेस के दो नेता अब आमने-सामने चुनाव लड़ रहे हैं। बृजपाल छप्पर का अपना अच्छा वोट बैंक तो है ही, साथ में कांग्रेस की भी काफी वोट में वह सेंध लगाएंगे। दूसरा बहुजन समाज पार्टी का इस चुनाव में इनेलो से गठबंधन है। ऐसे में बृजपाल को बसपा के अलावा कांग्रेस व इनेलो के भी वोट मिलेंगे।
साढौरा विधानसभा आरक्षित सीट है। यहां पर अनुसूचित जाति की वोट सबसे ज्यादा है। वहीं रेनू बाला पांच साल तक विधायक रहने के बावजूद क्षेत्र में कोई बड़ा काम नहीं करवा पाई। लोग सोशल मीडिया पर उनके प्रति अपनी भड़ास निकाल भी रहे हैं। कांग्रेस के वोट बैंक का रेनू बाला व बृजपाल छप्पर में ध्रुवीकरण भाजपा प्रत्याशी बलवंत सिंह के लिए लाभकारी रहेगा। वह दो बार इनेलो और एक बार भाजपा से विधायक रह चुके हैं।
जब वह इनेलो से प्रत्याशी थे तो वर्ष 2000 में उन्हें 30106 और 2005 में 35664 वोट मिले थे। 2014 में बतौर भाजपा प्रत्याशी मोदी लहर में उन्हें 63772 वोट मिले थे। 2019 का चुनाव वह रेनू बाला से 17020 वोट से हार गए थे। टिकट नहीं मिलने पर भाजपा के पूर्व प्रत्याशी दाता राम अब पार्टी से अलग हो गए हैं।
वह आजाद चुनाव लड़ने या किसी दल को समर्थन देने का निर्णय आजकल में करने वाले हैं। इससे भाजपा की वोट कटेगी। दूसरा कई और भाजपा नेता भी टिकट की दौड़ में थे। टिकट नहीं मिलने से वह खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर नहीं कर रहे हैं। सबसे बड़ा कारण सत्ता पक्ष के खिलाफ एंटी इंकंबेंसी है।