बुडिया गांव में कॉमस सर्विस सेंटर चलाने वाली मिस्बा हाशमी डिजिटल क्रांति में एक मिसाल बन गई है। वह हरियाणा की एकमात्र वीएलई हैं जिनसे प्रधानमंत्री ने सीधे बातचीत की और उसे युवा आंत्रप्रेन्योर के लिए देश का रोल मॉडल कहा। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद अवार्ड देकर सम्मानित भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज में विद्यार्थियों को केस स्टडी के रूप में मिस्बा की सफलता की कहानी पढ़ाई जा रही है। साथ ही भारत सरकार के पोर्टल पर उनकी सफलता का विडियो भी अपलोड किया गया है।
ग्रामीण पृष्ठभूमि और अल्पसंख्यक समुदाय से होने के चलते शुरूआत में उन्हें सामाजिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन साहस और दृढ़ संकल्प के साथ सभी चुनौतियों का सामना कर छह साल से अपने गांव बुडिया में सीएससी चला रहीं हैं। मिस्बा ने बताया कि उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे देश के प्रधानमंत्री से सराहना और बात करने का मौका मिलेगा।
कंप्यूटर साइंस स्नातक मिस्बा के पिता मोहम्मद इरशाद हाशमी व्यापारिक व्यक्ति हैं और मां रिटायर्ड शिक्षक हैं। वह अपनी तीन बहनों में सबसे छोटी हैं। 2013 में डिग्री पूरी होने के बाद उन्होंने एक प्राध्यापिका के रूप में काम करना शुरू कर दिया, लेकिन डिजिटल इंडिया मिशन के तहत जब उसे अटल सेवा केंद्रों के बारे में पता चला तो उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और वर्ष 2014 में उसने सीएससी केंद्र स्थापित किया। वह हरियाणा में शीर्ष वीएलई है। अब वह सीएससी चलाने के साथ-साथ हर महीने गांव की 100 लड़कियों को निशुल्क सैनेटरी पैड भी वितरित करती हैं।
मिस्बा ने बताया कि अशिक्षित, गरीब और वृद्ध व्यक्ति मेरे सीएससी सेंटर में आते हैं, उनके चेहरे पर खुशी देखकर मुझे बहुत संतोष होता है। सीएससी के रूप में मुझे ऐसा विशाल मंच मिला जिसके द्वारा पैसा और समाज सेवा दोनों कमाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि वह डिजी-पे के माध्यम से अपने ग्रामीणों को पेंशन वितरण सुविधा प्रदान करा रही हैं। एक दिन में उसने डिजीपे के तहत रिकार्ड 5 लाख रुपये के लेनदेन किए हैं। वह ग्रामीणों को डिजीपे के माध्यम से नकदी, किसान सब्सिडी भुगतान और पेंशन भुगतान में मदद करती हैं। वर्तमान में वह सीएससी पोर्टफोलियो के तहत सभी सेवाएं प्रदान कर रही है। उन्होंने बताया कि वह कंप्यूटर साइंस से स्नातक है और आईटी कंपनियों में आसानी से नौकरी मिल सकती है, लेकिन खुद का काम करने की ठानी और चुनौतियों को पार करते हुए आंत्रप्रेन्योर बन गई। इसलिए मैंने अपने बायो में खुद को एक्सीडेंटल आंत्रप्रेन्योर कहा है।
मिस्बा का कहना है कि पिताजी ने सीएससी खोलने का आइडिया दिया, लेकिन उन्होंने भी शाम पांच बजे तक घर आने की बात कही। लड़की होने के नाते काफी बंदिशें थी, लेकिन गांव के लोग दिन में अपना काम करते थे और पांच बजे के बाद सीएससी में आते थे। ऐसे में कई बार आधी रात तक लाइन में लगे ग्रामीणों के काम किए। मेहनत देखकर परिवारवालों ने हौसला बढ़ाया तो मेरी हिम्मत बढ़ गई। जो लोग शुरुआत में काम पर उंगुली उठाते थे, अब वे ना केवल उसकी सराहना करते हैं बल्कि अपनी बेटियों को भी काम करने की छूट देने लगे हैं।
misbah became role model of digital revolution- फोटो : Yamuna Nagar