गांव मारवा खुर्द में अपनी मां ऊषा कमल के साथ सुनीर व सुनीत।
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बिलासपुर। यूक्रेन के खारकीव में फंसे भाई-बहन शुक्रवार शाम अपने गांव मारवा खुर्द में सकुशल लौट आए। जैसे ही सुनीर व सुनीत को माता-पिता ने देखा तो वह अपने आंसू नहीं रोक पाए। दोनों बच्चों को अपने गले से लगा लिया। दोनों स्वदेश भले ही लौट आए परंतु अब भी उन्हें बमबारी व लोगों की चीखों की आवाज का एहसास हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई बार तो खाना बनाते हुए सायरन व धमाके की आवाज आने पर खाना छोड़कर बंकर में जाना पड़ा। दिल्ली से जब दोनों को गाड़ी में लाया जा रहा था दोनों चैन की नींद सोते हुए आए।
गांव मारवा खुर्द के प्राध्यापक सिया राम व कांग्रेस नेत्री ऊषा कमल की बेटी सुनीर व बेटा सुनीत चार वर्ष पहले यूक्रेन में एमबीबीएस करने गए थे। 10 दिनों से रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के पश्चात बिगड़े हालात को देखते हुए माता-पिता को सकुशल वापसी की चिंता सता रही थी। सुनीर व सुनीत ने बताया कि वह 24 फरवरी की सुबह लगभग सवा पांच उनके हॉस्टल के समीप दो-तीन जोर से धमाके हुए। वह डर से अचानक जाग गए। कुछ ही देर में सायरन बजा। कालेज प्रशासन ने अवगत कराया कि रूस ने हमला कर दिया है। सुबह 11 बजे बजे तक 20 बम गिर चुके थे।
हमले के बाद उन्हें यूनिवर्सिटी के हॉस्टल से बंकर में शिफ्ट कर दिया गया। वह सुबह कुछ देर के लिए खाना बनाने हॉस्टल में आते। कई बार तो खाना बनाते हुए सायरन व धमाके की आवाज आने पर खाना छोड़कर बंकर में जाना पड़ा। बंकर की लाइटें बंद कर दी जाती थी। वापसी को लेकर यूक्रेन प्रशासन ने बिल्कुल भी सहयोग नहीं किया। एक मार्च की सुबह 35 विद्यार्थियों के साथ स्टेशन पर जाने के लिए निकले। टैक्सी का तीन गुणा किराया मांगा गया। जिस कारण वह पैदल ही आठ किलोमीटर पैदल चले। स्टेशन पर पहुंचते ही स्टेशन के पास भी धमाके हुए। स्टेशन पर पहुंचे तो वहां पांव रखने तक की जगह नहीं थी। वह मुश्किल से ट्रेन में चढ़े। ट्रेन से लवीव पहुंचे। वहां से टैक्सी से पोलैंड पहुंचे। जब वह भारत के बेस कैंप में पहुंचे तो उन्हें कुछ राहत मिली। माता- पिता ने बच्चों के सकुशल पहुंचने पर मंदिर में पूजा पाठ किया।
बंकर से निकलते ही हुआ धमाका
गांव भगवानपुर की इंदू कांबोज भी यूक्रेन से निकल कर शुक्रवार को अपने घर पहुंची। वह भी खारकीव में चार साल से एमबीबीएस कर रही थी। इंदू ने बताया कि यूनिवर्सिटी के हॉस्टल के साथ ही बेसमेंट था जिसमें वह कई दिन तक 250 से 300 विद्यार्थियों के साथ पांच दिन छिपी रही। हमला होने से एक दिन पहले उन्होंने जो बिस्कुट, रस्क लिए थे वही खाकर जिंदा रहे। यूनिवर्सिटी प्रशासक ने कहा था वह उनकी सुरक्षा का जिम्मा नहीं ले सकते। यदि कोई विद्यार्थी अपने रिस्क पर वहां से जाना चाहता है तो जा सकता है। एक मार्च को वह बेसमेंट से निकले थे। जैसे ही वह बेसमेंट से कुछ दूरी पर पहुंचे तो यूनिवर्सिटी के पास हमला हुआ। इसी हमले में भारतीय छात्र की भी मौत हुई थी। वहां से ट्रेन से कई घंटों का रास्ता तय करके पोलैंड के बॉर्डर पर पहुंची। वीरवार रात वह फ्लाइट में बैठी और शुक्रवार को दिल्ली पहुंचे। घर पहुंचने पर मां ललतेश कौर, पिता नरेश कुमार,बड़े भाई गौरव कांबोज व मामा सुमित कांबोज ने इंदू का स्वागत किया।