संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा माॅडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 10वें दिन महा साध्वी डॉक्टर स्वाति महाराज ने प्रवचनों से भक्तों को सराबोर किया। उन्होंने एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि एक बार एक व्यक्ति ने संत से पूछा कि गुरुजी इस संसार में सबसे दरिद्र व्यक्ति कौन है। गुरु महाराज ने कहा कि जो धर्म से वंचित है, वह संसार का सबसे दरिद्र व्यक्ति है।
उन्होंने बताया कि धर्म नहीं तो समझो कुछ भी नहीं। जीवन छोटा है या बड़ा इसका महत्व नहीं है। महत्व इस बात का है कि हम धर्म ध्यान कितना कर रहे हैं। दान पुण्य लोक कल्याण के कार्य कितने कर रहे हैं। इंसान का सबसे बड़ा धर्म है किसी की सेवा करना और किसी के काम आना। इंसान में इंसानियत होनी चाहिए। अगर किसी दुखी को देखकर हमारा हृदय द्रवित नहीं होता है तो हम सही मायने में इंसान नहीं हैं।
दान का अर्थ होता है देने में आनंद। एक उदारता का भाव प्राणी मात्र के प्रति एक प्रेम एवं दया का भाव है किंतु जब इस भाव के पीछे कुछ पाने का स्वार्थ छिपा हो तो क्या वह दान रह जाता है? गीता में भी लिखा है कि कर्म करो, फल की चिंता मत करो। हमारा अधिकार केवल अपने कर्म पर है उसके फल पर नहीं।
हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है यह तो संसार एवं विज्ञान का साधारण नियम है। उन्मुक्त ह्रदय से श्रद्धा पूर्वक एवं सामर्थ्य अनुसार दान एक बेहतर समाज के निर्माण के साथ-साथ स्वयं हमारे भी व्यक्तित्व निर्माण में सहायक सिद्ध होता है। सृष्टि के नियमानुसार उसका फल तो कालांतर में निश्चित ही हमें प्राप्त होगा।
उनके अनुसार विद्या का दान सर्वश्रेष्ठ दान होता है, क्योंकि उसे न तो कोई चुरा सकता है और न ही वह समाप्त होती है बल्कि कालांतर में विद्या बढ़ती ही है। एक व्यक्ति को शिक्षित करने से हम उसे भविष्य में दान देने लायक एक ऐसा नागरिक बना देते हैं जो समाज को सहारा प्रदान करे न कि समाज पर निर्भर रहे।
सूर्य अपनी रोशनी, फूल अपनी खुशबू, पेड़ अपने फल, नदियां अपना जल, धरती अपना सीना छलनी कर के भी दोनों हाथों से हम पर अपनी फसल लुटाती है। इसके बावजूद न तो सूर्य की रोशनी कम हुई, न फूलों की खुशबू, न पेड़ों के फल कम हुए न नदियों का जल, अत: दान एक हाथ से देने पर अनेकों हाथों से लौट कर हमारे ही पास वापस आता है।