जगाधरी। ऐतिहासिक कपालमोचन में पहुंच रहे श्रद्धालुओं को यहां बिक रहे गिल्ली-डंडा पर नजर पड़ते ही बचपन की याद आ जाती है। इसे देखकर लोगों के चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है।
मेले में आए बुजुर्ग शमशेर, मायाराम व लीलू का कहना है कि पहले शहर व गांवों की गलियों में बच्चे गिल्ली-डंडा लेकर खेलते दिखते थे। गिल्ली-डंडा खेला जाने वाला ऐसा पारंपरिक खेल रहा है कि इसके लिए बच्चे खाने-पीने की सुध तक खो देते हैं। आधुनिकता की आंधी में यह पारंपरिक खेल लगभग लुप्त हो गया है।
अब गांव देहात में भी बच्चे गिल्ली-डंडा खेल के बारे नहीं जाते हैं। अब गिल्ली-डंडा, कंचे इत्यादि खेल अब केवल किताबी में पढ़ने और पुराने लोगों के किस्सों में ही सुनने को मिलते हैं। कारीगर शीशम की लकड़ी को तराश कर डिजाइन बने गिल्ली-डंडे की कीमत मात्र 30 से 50 रुपये हैं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर निवासी उवैश ने बताया कि मेले में गिल्ली-डंडा लोगों को खूब भा रहा है। गिल्ली-डंडा हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। यही नहीं कई समुदायों में घर के मंदिर में इसे रखकर पूजा भी जाती है। संवाद