संवाद न्यूज एजेंसी
व्यासपुर। क्षेत्र के दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी राजविंद्र भारती ने प्रवचन किया। इस दौरान उन्होंने श्रद्धालुओं को भक्ति के सूत्रों के बारे में विस्तार से बताया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में गुरु प्रेम प्रकट हो जाना आलौकिक उपलब्धि है। जो केवल प्रारब्ध के पुण्य कर्म संस्कारों एवं परमात्मा की असीम कृपा के परिणाम स्वरूप ही प्राप्त हो पाती है। जिस प्रकार दूध रखने के लिए हम साफ पात्र ढूंढते है, उसी तरह परमात्मा व प्रकृति भी गुरु प्रेम रूपी संपदा रखने के लिए सरल हृदय खोजते हैं।
आत्मा जब मानव तन धारण करता है तो उसके साथ पूर्वजन्म के प्रारब्ध व संचित कर्म तब तक चलते रहते हैं, जब तक वे परिपक्व होकर मनुष्य को सुख या दुख रूपी फल प्रदान न कर दें। निराकार परमात्मा जब साकार स्वरूप धारण कर धरती पर गुरु रूप में आते हैं, तब संपूर्ण जीवों पर मां की तरह प्रेम लुटाते हैं। उसे करुणा सिंधु व दया का सागर कहा जाता है, चूंकि उनकी कृपा दृष्टि सभी पर समान रूप से रहती है।
उन्होंने बताया कि जब कोई जीवात्मा अहंकार त्यागकर गुरु की शरण में आता है, तो गुरु उसके आत्म कल्याण हेतु उसे भक्ति मार्ग पर अग्रसर करते हैं। पूर्ण गुरु की शरण प्राप्त करके भी आत्म कल्याण कर लेना सहज नहीं है, चूंकि निस्संदेह गुरु प्रेम व ममता शिष्य के लिए कभी भी कम नहीं होती लेकिन हमारा मन और मन के विचार पल प्रतिपल बदलते रहते हैं।
उन्होंने कहा कि हृदय में गुरु प्रेम धारण करके पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से गुरु आज्ञा को शिरोधार्य कर उसे पूर्ण करने के लिए प्राणपण से जुट जाना शिष्य की आत्मिक जागृति है। सत्संग में साध्वियों ने भजनों से गुरु महिमा का गुणगान किया।