संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कृषि विज्ञान केंद्र दामला रविवार को एक दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र के मुख्य समन्वयक डॉ. संदीप रावल ने कृषि विस्तार कर्मियों को संबोधित करते हुए धान की सीधी बिजाई के महत्व और इसके माध्यम से जल संचयन के बारे में जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि आज का जल, जीवन देगा कल के संदेश को ध्यान में रखते हुए हमें जल संचयन और धान की खेती के लिए वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना चाहिए। कृषि विकास एवं विस्तार अधिकारियों ने धान की सीधी बिजाई और एकीकृत फसल प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और अपने सवालों के जवाब प्राप्त किए।
डॉ. रावल ने बताया कि एक ही गहराई पर बार-बार जुताई करने और धान की फसल में कद्दू किए जाने से भूमि की गहराई में कठोर परत बन जाती है। इससे भूमि में पानी का रिसाव नहीं हो पाता और बरसात का पानी खेत से बहकर नदी-नालों के माध्यम से व्यर्थ चला जाता है, जिससे भूजल स्तर का विस्तार नहीं हो पाता।
धान की सीधी बिजाई भूमि की संरचना के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इसमें मिट्टी की जुताई कम होती है, जिससे मिट्टी की संरचना बनी रहती है। उन्होंने धान की विभिन्न किस्मों के बारे में विस्तार से जानकारी प्रदान की। डॉ. अराधना बाली ने धान की सीधी बिजाई की विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बीज उपचार, खरपतवार नियंत्रण, कीट और बीमारी नियंत्रण के महत्व पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि धान की सीधी बिजाई में कम लागत और अधिक मुनाफे की संभावनाएं हैं, जिससे किसान इसे तेजी से अपनाने लगे है। श्रमिकों की कमी भी इस पद्धति को अपनाने की गति को बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि धान की सीधी बिजाई प्रणाली न केवल किसानों की आय बढ़ाती है, बल्कि मृदा की उर्वरा शक्ति, भूजल स्तर, वातावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को भी लाभ पहुंचाती है।
डॉ. नरेंद्र गोयल ने बताया कि यह खाद पोषक तत्वों से भरपूर होती है और केमिकल फर्टिलाइजर की तुलना में बहुत ही सुरक्षित और कम खर्चीली होती है। इसके अलावा, यह खेत की संरचना में सुधार करने के साथ-साथ कार्बनिक तत्वों में भी बढ़ोतरी करती है। जो जमीन की उर्वरक शक्ति को बढ़ा देती है। इस अवसर पर उपनिदेशक कृषि डॉ. आदित्य डबास, उप मंडल कृषि अधिकारी डॉ. अजय, तकनीकी सहायक डॉ. कर्ण सैनी और लगभग 70 कृषि विकास अधिकारी उपस्थित रहे।