साढौरा। ऐसा पहली बार हुआ जब किसी चुनाव में युवाओं की भूमिका न के बराबर रही। साढौरा नगरपालिका चुनाव के लिए बनाए गए बूथों पर मतदान करने के लिए युवा नदारद दिखे। वहीं इसके विपरीत बुजुर्गों ने दिल खोल कर मतदान किया। भले ही बुजुर्ग चलने में असमर्थ और बीमार थे। इसके बावजूद वह बूथों तक पहुंचे।
किसी के साथ पत्नी थी तो किसी के साथ बेटा। प्रशासन युवाओं को मतदान केंद्रों तक लाने में असफल रहा। वहीं बुजुर्ग शायद वोट का महत्व जानते हैं। इस पर सुबह से ही सभी बूथों पर बुजुर्गों का आना जाना लगा रहा। कस्बा के 102 वर्षीय सेवा राम भी वोट डालने के लिए बूथ पर पहुंचे।
शुक्रवार सुबह सात बजे से पहले ही बूथों पर मतदाताओं की लाइन लगने लगी थी। मतदाताओं में महिलाएं व पुरुष शामिल थे। धीरे-धीरे बजुर्ग भी मतदान केंद्रों पर पहुंचने लगे। गर्मी व बीमारी को दरकिनार करते हुए बुजुर्ग मतदान केंद्रों पर आए। कई बुजुर्ग तो ऐसे थे, जिन्हें पैरालाइज की बीमारी थी। फिर भी वह हाथ में डंडा व परिजनों के कंधे का सहारा लेते हुए वोट डालने पहुंचे। उनकी बीमारी को देखते हुए प्रशासन ने भी मतदान करने में प्राथमिकता दी। एक बुजुर्ग को मतदान केंद्र में आने से लेकर वोट डालकर वापस जाने में पांच मिनट का समय भी मुश्किल से लगा।
खास बात यह है कि देश में सबसे ज्यादा युवा मतदाता हैं। इसके बाद भी युवाओं ने अपनी वोट की ताकत का इस्तेमाल करना मुनासिब नहीं समझा। युवा मतदान केंद्रों से दूर रहे। वहीं पहली बार वोट डालने को लेकर युवाओं में काफी उत्साह होता है। परंतु नगरपालिका साढौरा के चुनाव में सब इसके विपरीत हुआ। मतदान केंद्र पर आने की बजाय युवा शक्ति ने घरों में ही रहना मुनासिब समझा। इनकी अनुपस्थिति सभी केंद्रों पर चर्चा का विषय रही। अधिकारियों के मुताबिक जिनके पहली बार वोट बने थे, उनमें से पांच प्रतिशत भी वोट डालने नहीं पहुंचे। संवाद
महिलाओं की लगीं लंबी लाइनें
महिलाओं ने भी लंबी लाइनों में लगकर मतदान किया। डीएवी पब्लिक स्कूल हो या फिर हिंदू स्कूल, दोनों जगहों पर महिलाओं की लंबी लाइनें रहीं। 18 साल उम्र पूरी कर वोट बनवा चुकीं युवतियां भी वोट डालने के लिए नहीं आई। दोपहर होने से पहले ही ज्यादातर महिलाएं वोट डाल चुकी थी। इसके बाद उन्होंने घरों में जाकर रसोई को संभाला और परिवार के लिए भोजन बनाया।