संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में रविवार को साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी सरस्वती भारती ने गुरु की कृपा के महत्व के बारे में विस्तार से बताया।
उन्होंने कहा कि संशय व विश्वास दोनों ही हमारे अंत:करण की अवस्थाएं हैं। अंतर केवल इतना है कि अंत:करण की तामसिकता संशय को जन्म देती है और सात्विकता विश्वास प्रकट करती है। हमारी आत्मा परमपिता परमात्मा का अंश है, जिसमें प्रेम, श्रद्धा विश्वास, समर्पण इत्यादि गुण सुषुप्त रूप से विद्यमान हैं।
किंतु हमारी आत्मा के इन दिव्य गुणों पर कलियुग व माया का आवरण तब तक पड़ा रहता है। जब तक आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान नहीं होती। जब जीवन में एक पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ गुरु ब्रह्म ज्ञान के द्वारा अपने शिष्य के प्रारब्ध व संचित कर्मों की मलिनता को साफ करके उसकी आत्मा का परिचय परमात्मा के प्रकाश स्वरूप से करवाते हैं।
तब शिष्य के सुषुप्ति में पड़े सद्गुण अंत करण से उघड़ कर उसके व्यक्तित्व में झलकते हैं। गुरु बाहर से अपने शिष्य को कुछ नहीं देता अपितु वे तो अपने तपोबल का संबल प्रदान कर के उसकी आत्मा को सशक्त बनाता है।श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन को समझाते कहते हैं कि मानव के संपूर्ण जीवन को प्रभावित करने वाले तीन गुण होते हैं।
उन्होंने बताया कि सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण मनुष्य के जीवन के वो आधार हैं जिन पर उसके जीवन की सभी क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं निर्धारित होती हैं। जब मनुष्य निरंतर ध्यान साधना करते हुए इन गुणों को अपने आत्म बल और परमात्मा में विश्वास के द्वारा संतुलित कर के अपने जीवन में उतारना सीख लेता है तब उसका जीवन औरों के लिए भी सुखदायी एवं कल्याणकारी हो जाता है।