संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। मानव उत्थान सेवा समिति के तत्वावधान में श्री हंस ज्योति मंदिर जगाधरी में गंगा सप्तमी एवं गंगा दशहरा के उपलक्ष्य में रविवार काे सद्भावना सत्संग समारोह एवं भंडारे का आयोजन किया गया। मंदिर की प्रभारी महात्मा चतुर्वेदी बाई एवं महात्मा गरिमा बाई ने सत्संग एवं भजनों से भक्तों को भावविभोर कर दिया। भजन सुनकर श्रद्धालु झूमने लगे।
महात्मा चतुर्वेदी बाई ने कहा कि पुराणों के अनुसार गंगा का जन्म ब्रह्मा जी के कमंडल से हुआ है। गंगा ने अपने जल से भगवान विष्णु की चरण वंदना करने के उपरांत विष्णु लोक में स्थान पाया। देवी गंगा के प्रचंड प्रवाह वेग ने भागीरथ के राज्य के मार्ग में ऋषि जन्हु के आश्रम को नष्ट कर दिया था। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने गंगा का सारा जल पी लिया। तब भागीरथ के विनय और प्रार्थना पर ऋषि जन्हु ने गंगा को मुक्त किया। यह तिथि वैशाख शुक्ल पक्ष सप्तमी थी।
इस दिन गंगा मुक्ति के कारण इसे गंगा जयंती, पुण्य जन्म माना जाता है। इस बार गंगा सप्तमी तीन जून को पड़ रही है। पृथ्वी पर गंगा का अवतरण दशमी तिथि को हुआ, जिसे गंगा दशहरे के नाम से जाना जाता है। यह तिथि पांच जून को पड़ रही है। गंगा को एक नदी ही नहीं बल्कि जीवनदायिनी, पापनाशिनी, मोक्षदायिनी भी माना गया है। गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है।
जीवन के अंतिम समय में मरने वाले व्यक्ति के मुख में गंगाजल डालने के पीछे यही विश्वास और मानता है। गरुड़ पुराण के अनुसार मृतक शरीर की अस्थियों को गंगा में विसर्जन करने से मृतक की आत्मा को शांति मिलती है और वह ब्रह्म लोग को जाता है। महात्मा गरिमा बाई ने कहा कि सत्संग से जीव का लोक व परलोक सुधर जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी रामायण में लिखते हैं कि जो हर्षित मन से साधु संत के बात सुनने के बाद मनन करते हैं वह सहज में ही चार फलों की प्राप्ति कर जाते हैं। भगवान का नाम हर जगह व्यापक है।